चंडीगढ़। पीजीआई में पिछले 10 दिनों के दौरान तीन परिवारों ने अंगदान का निर्णय लेकर 13 जिंदगियों में खुशियां लौटाई हैं। अंगदान से मिली छह किडनी गंभीर मरीजों को प्रत्यारोपित कर जहां उनकी जिंदगी बचाई गई है, वहीं छह कार्निया प्रत्यारोपित कर 6 नेत्रहीनों की जिंदगी में नेत्र ज्योति बिखेरी है। इसके अलावा हृदय का मिलान न होने पर उसे एयर लिफ्ट कर दिल्ली के मरीज की जान बचाई गई है।
अंगदाता परिवार के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए पीजीआई निदेशक प्रो. विवेक लाल का कहना है कि अपने ही परिवार के सदस्य के दुखद निधन के बीच कुछ अजनबियों के जीवन को बचाने के लिए परे सोचना अप्रत्याशित और अकल्पनीय है। लेकिन इन तीन दाता परिवारों में समाज के लिए कुछ करने का यह अनुकरणीय साहस था, तब भी जब उनकी अपनी दुनिया तबाह हो गई। वहीं पीजीआई के चिकित्सा अधीक्षक व रोटो के नोडल अधिकारी प्रो. विपिन कौशल ने बताया कि किसी भी अंग दान और प्रत्यारोपण को सफल बनाने के लिए व्यापक काम किया जाता है। मृतक के परिवार की सहमति प्राप्त करने से लेकर अंगों को सुरक्षित रूप से प्राप्त करने, अंगों के आवंटन और परिवहन के लिए, चिकित्सकों, प्रत्यारोपण समन्वयकों, प्रत्यारोपण टीमों, ओटी टीम, फोरेंसिक विभाग, सहायता विभाग, रोटो और नोटो और पुलिस सहित कई टीमें काम कर रही हैं। अंगदान से जीवन बचाने का यह क्रम सभी टीमों के बीच सफल समन्वय का परिणाम है।
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किडनी और कार्निया पीजीआई को, दिल दिल्ली में धड़का
मोरिंडा निवासी 60 वर्षीय दीनानाथ को 4 सितंबर को तेज रफ्तार वाहन ने पीछे से टक्कर मार दी। सिर में गंभीर चोट आने पर परिजनों ने तत्काल सिविल अस्पताल खरड़ में भर्ती कराया। गंभीर स्थिति देखते हुए मरीज घायल को पीजीआई रेफर किया गया। पीजीआई में 2 हफ्ते तक चले इलाज के बाद भी दीनानाथ की स्थिति में सुधार नहीं हुआ। डॉक्टरों की टीम ने स्थिति का आकलन करते हुए उन्हें 17 सितंबर को ब्रेन डेड घोषित कर दिया।
परिजनों से मिली अनुमति पर उनकी दोनों किडनी और दोनों कार्निया पीजीआई की प्रतिक्षा सूची में शामिल चार मरीजों को प्रत्यारोपित की गई जबकि दिल का मिलान न होने पर नोटो से मिली सूचना के आधार पर उसे ग्रीन कॉरिडोर के माध्यम से 18 सितंबर की सुबह 10.45 बजे दिल्ली के लिए एयरलिफ्ट किया गया। यहां आरएंडआर सेना अस्पताल के एक सेना के जवान को दिल प्रत्यारोपित किया गया। दीनानाथ की पत्नी कुसुम देवी का कहना है कि उनके जाने से हम तबाह हो गए लेकिन अंगदान का निर्णय लेने के बाद इस बात का संतोष है कि उनके अंगों से कुछ बच्चों को अपने माता-पिता को बचाने में मदद मिली होगी। यह मेरे पति के लिए हमारी सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है।
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समय गंवाने की बजाय लिया अंगदान का निर्णय
वहीं हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर के गांव गंधलविल निवासी 47 वर्षीय जसवंत सिंह भी 10 सितंबर को सड़क दुर्घटना के शिकार हो गए। उन्हें भी स्थानीय सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया। हालत बिगड़ने पर परिजन उन्हें 11 सितंबर को पीजीआई लेकर आए। इलाज के दौरान 14 सितंबर को जसवंत को ब्रेन डेड घोषित कर दिया। जसवंत की पत्नी ममता ने समय गंवाए बिना अंगदान का निर्णय लिया। इसके बाद जसवंत की दोनों किडनी और दोनों कार्निया प्रतीक्षा सूची में शामिल मरीजों को प्रत्यारोपित की गई। ममता का कहना है कि दुख की घड़ी में अंगदान का निर्णय लेकर हम जाने वाले को हमेशा के लिए दुनिया में अमर कर देते हैं। अंगदान से हम कम से कम किसी और को अपनों को खोने के दर्द और सदमा से तो बचा पाएंगे।
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साहसिक निर्णय.. बेटे को खोकर भी लिया अंगदान का निर्णय
पंजाब के रोपड़ निवासी परिवार ने सड़क दुर्घटना में अपने 13 साल के बेटे को खोकर भी अंगदान का निर्णय लेकर मिसाल पेश की है। जानकारी के अनुसार 13 साल का बेटा दोपहिया वाहन पर स्कूल जाते समय 5 सितंबर को एक अन्य वाहन से टकरा गया जिससे उसके सिर में गंभीर चोट लग गई। दुर्घटना के बाद लड़के को तुरंत पास के एक सिविल अस्पताल ले जाया गया जहां से उसी दिन उसे पीजीआई रैफर कर दिया गया। इलाज के दौरान उसे 8 सितंबर को ब्रेन डेड घोषित कर दिया। परिवार की सहमति से बच्चे का अंगदान कराया गया, जिसमें प्राप्त दोनों किडनी और दोनों कार्निया 4 मरीजों को प्रत्यारोपित किया गया।