चंडीगढ़। बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य की पहली शर्त मानी जाने वाली ब्रेस्टफीडिंग को लेकर चंडीगढ़ में चिंता बढ़ाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएचएफएस-6) के अनुसार छह माह तक केवल मां का दूध पाने वाले बच्चों का प्रतिशत पिछले सर्वे की तुलना में काफी घट गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव आने वाले वर्षों में बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता और पोषण स्तर पर असर डाल सकता है।
एनएचएफएस-6 (2023-24) के आंकड़ों के अनुसार चंडीगढ़ में छह माह से कम उम्र के केवल 43 प्रतिशत बच्चों को ही एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग (सिर्फ मां का दूध) मिल रहा है। एनएचएफएस-5 (2019-21) में यह आंकड़ा 63.7 प्रतिशत था। यानी पांच साल के भीतर इसमें करीब 20 प्रतिशत अंकों की गिरावट दर्ज की गई है। पीजीआई के एडवांस पीडियाट्रिक सेंटर के डॉ अरुण बंसल के अनुसार जन्म के बाद पहले छह माह तक बच्चे को केवल मां का दूध दिया जाना चाहिए। इससे बच्चे को संक्रमण, डायरिया, निमोनिया और कई अन्य बीमारियों से सुरक्षा मिलती है। इसके बावजूद शहरी क्षेत्रों में बदलती जीवनशैली, कामकाजी माताओं की बढ़ती संख्या और बाजार में उपलब्ध वैकल्पिक फीडिंग उत्पादों के कारण ब्रेस्टफीडिंग की अवधि प्रभावित हो रही है।
सर्वे में यह भी सामने आया कि 6 से 23 माह के बच्चों में पर्याप्त आहार प्राप्त करने वालों का प्रतिशत भी कम हुआ है। इससे संकेत मिलता है कि पूरक आहार और स्तनपान दोनों मोर्चों पर जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है। डॉ. अरुण के मुताबिक जन्म के पहले घंटे में स्तनपान शुरू करना और छह माह तक केवल मां का दूध देना बच्चों में कुपोषण और संक्रमण के खतरे को कम करने का सबसे प्रभावी उपाय है। चंडीगढ़ में टीकाकरण के बेहतर आंकड़ों के बीच ब्रेस्टफीडिंग में आई यह गिरावट स्वास्थ्य तंत्र के लिए चिंता का विषय मानी जा रही है।
क्या कहता है विश्व स्वास्थ्य संगठन
जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान शुरू करने की सलाह
पहले 6 माह तक केवल मां का दूध
6 माह बाद पूरक आहार के साथ 2 वर्ष या उससे अधिक समय तक स्तनपान जारी रखने की सिफारिश
मां के दूध में बच्चे की जरूरत के अधिकांश पोषक तत्व मौजूद होते हैं
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इसलिए मां के दूध को कहते हैं अमृत
कोलोस्ट्रम (पहला पीला दूध)
जन्म के बाद निकलने वाला गाढ़ा पीला दूध एंटीबॉडी से भरपूर होता है। इसे बच्चे की पहली वैक्सीन भी कहा जाता है।
एंटीबॉडी और इम्यून सेल्स
मां का दूध संक्रमण से लड़ने वाले तत्वों से भरपूर होता है, जो बच्चे को निमोनिया, डायरिया और कई अन्य बीमारियों से बचाते हैं।
डीएचए और फैटी एसिड
ये तत्व बच्चे के मस्तिष्क और आंखों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
प्रोटीन, विटामिन और मिनरल्स
बच्चे की उम्र और जरूरत के अनुसार पोषण देने वाले तत्व प्राकृतिक रूप से मौजूद रहते हैं।
ओलिगोसैकेराइड्स ये अच्छे बैक्टीरिया को बढ़ावा देते हैं और बच्चे की आंतों को मजबूत बनाते हैं।
पानी की पर्याप्त मात्रा
छह महीने तक बच्चे को अलग से पानी देने की जरूरत नहीं होती। मां के दूध में पर्याप्त पानी मौजूद रहता है।
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ये भी जाने
मां के दूध में 200 से ज्यादा जैव सक्रिय तत्व पाए जाते हैं।
हर मां का दूध उसके बच्चे की जरूरत के अनुसार बदलता रहता है।
समय से पहले जन्मे बच्चों की मां के दूध में विशेष पोषक तत्व अधिक होते हैं।