मां व्यस्त है... मल्लिका को इसकी सुध तक नहीं... वह तो बारिश को अपने शब्दों में उतारती चली जाती है... कभी कहती है चुनरी उड़ गई तो कभी कहती है बारिश की कोमल बूंद अब तक महसूस हो रही हैं।
वास्तव में मल्लिका के इन शब्दों में छुपे हैं कवि कालिदास... जिससे वह प्रेम करती है। यह है रंगमंच थिएटर कंपनी (सात्विक आर्ट्स सोसायटी) द्वारा मोहन राकेश के लिखे नाटक अषाढ़ का एक दिन का पहला दृश्य।
जिसको रंगमंच पर निर्देशित किया है अमित सनौरिया और सरवर अली की जोड़ी ने। इसमें परिकल्पना आत्मप्रकाश की और संगीत परिकल्पना देवेंद्र अहिरवार की रही।
टैगोर थिएटर में रविवार को मंचित इस नाटक की कहानी आगे बढ़ती है। इसमें बारिश की कल्पनाओं को सहेजे झूमती मल्लिका के घर में प्रवेश होता है कालिदास का। वह एक हिरण के बच्चे को लिए हुए घर में प्रवेश करते हैं। हिरण के बच्चे को एक राज कर्मचारी ने घायल किया है।
वह हिरण के बच्चे को दूध पिलाने का प्रयास करते हैं और इसी बीच घर में प्रवेश करता है कर्मचारी दंतुल। इन कर्मचारियों को अचानक मालूम पड़ता है कि यह कालिदास तो वही कवि हैं, जिनको राजा ने राजकवि बनाने के लिए बुलाया है। मल्लिका खुश होती है। कालिदास कहते हैं कि वह राजकवि नहीं बनना चाहते, लेकिन मल्लिका उनको समझाती है और भेजती है।
कालिदास राजकवि बन जाते हैं और राजा उनको कुछ समय बाद उनको एक राज्य का राजा भी बना देते हैं। कालिदास कश्मीर जाते हैं और वहां वह कविताओं में इतना मगन हो जाते हैं कि किसी की ओर ध्यान नहीं देते। वह अपनी धर्मपत्नी से मल्लिका का जिक्र करते हैं।
उनकी धर्मपत्नी मल्लिका के पास जाती है और उसके घर को ठीक करवाने की बात करती है। कालिदास राजपाट छोड़ देते हैं और मल्लिका के पास आते हैं। वहां उनको बच्चा दिखाई देता है। फिर वह मल्लिका को छोड़कर चले जाते हैं।