चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने संज्ञेय अपराध की सूचना के बावजूद एफआईआर दर्ज न करने के बढ़ते मामलों पर कड़ा रुख अपनाते हुए पंजाब, हरियाणा और यूटी चंडीगढ़ को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने कहा कि पुलिस घोड़े के आगे गाड़ी जोड़ने का काम कर रही है। हाईकोर्ट ने अब तीनों पुलिस महानिदेशकों को इस मामले में विस्तृत शपथ पत्र दाखिल करने का आदेश दिया है।
मुख्य न्यायाधीश शील नागू की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने नयागांव में वकील के घर में पुलिस के जबरन प्रवेश व बदसलूकी की शिकायत पर संज्ञान लेते हुए इसे जनहित याचिका के तौर पर सुनने का निर्णय लिया था। हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने इस मामले में शिकायत की थी। अदालत ने कहा कि घटना नवंबर माह की थी लेकिन संबंधित मामले में एफआईआर 16 दिसंबर 2025 को दर्ज की गई। शिकायत में संज्ञेय अपराध का स्पष्ट उल्लेख था, इसके बावजूद पुलिस को एफआईआर दर्ज करने में 15 दिन से अधिक लग गए।
सुनवाई के दौरान बार सदस्यों की ओर से अन्य मामलों का भी हवाला दिया गया, जिनमें संज्ञेय अपराध की सूचना देने के बावजूद अब तक एफआईआर दर्ज नहीं की गई। पीठ ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 154 का उल्लेख करते हुए कहा कि कानून की मंशा बिल्कुल स्पष्ट है पहले एफआईआर, फिर जांच। अदालत ने कहा कि पुलिस को सूचना मिलते ही मामला दर्ज करना चाहिए और उसके बाद जांच या पूछताछ की प्रक्रिया प्रारंभ करनी चाहिए, न कि उससे पहले। अदालत ने पुलिस की उस प्रवृत्ति पर कड़ी आपत्ति जताई जिसमें एफआईआर दर्ज करने से पहले ही विस्तृत जांच या पूछताछ की जाती है। पीठ ने कहा कि यह घोड़े से पहले गाड़ी रखने जैसा है। एक मामले में बिना एफआईआर दर्ज किए क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करने पर अदालत ने इसे कानूनी समझ से परे बताया।
अदालत को अदालत रहने दें, इसे थाना न बनाएं
चीफ जस्टिस ने सुनवाई के दौरान वकीलों से अनुरोध किया कि केवल बेहद गंभीर मामले जहां एफआईआर दर्ज नहीं हुई है केवल उन्हें ही हमारे समक्ष रखें। कोर्ट ने कहा कि हमारा काम जांच कैसे करना है यह जांच एजेंसी को सिखाना नहीं है बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि तय कानूनी प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित हो। कोर्ट ने कहा कि अनावश्यक मामले इस प्रकार जनहित याचिका में लाकर कोर्ट को थाना बनाने का प्रयास न किया जाए।