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नए वोटर्स और पुराने नारे, बहुत नाइंसाफी है

Thu, 03 Apr 2014 02:29 PM IST
प्रवीण पाण्डेय/अमर उजाला, चंडीगढ़
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एक दौर था जब चुनाव नारों पर लड़ा जाता था और नारे चुनाव जितवाने में अहम भूमिका निभाते थे। अब राजनीतिक दलों के पास न तो नारे रह गए हैं और न ही मुद्दे।
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एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप और शेर-ओ-शायरी से प्रत्याशी अपनी भड़ास निकालते हैं। पार्टी के थिंक टैंक कहे जाने वाले वरिष्ठ नेताओं का कोई प्रभावी नारा चुनावी मैदान में नजर नहीं आ रहा है।

प्रभावी नारों की इस श्रृंखला में कांग्रेस आगे रही है, लेकिन इस बार फिसड्डी है। जात पर न पात पर, इंदिरा जी की बात पर, मोहर लगेगी हाथ पर और हर खेत को पानी, हर हाथ को काम जैसे नारे पुराने हो चुके हैं, लेकिन इन्हीं नारों के सहारे उस दौर में कांग्रेस को बढ़त मिली थी।
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बात चुनाव से अलग हटकर करें तो यह नारे मैजिक मल्टीप्लायर का काम करते हैं। इस तरह का कैंपेन आज के दौर में पार्टियों की जरूरत है। फील गुड जैसा नारा देने वाली भाजपा का यह नारा अधिक  प्रभावी नहीं हुआ, लेकिन अबकी बार अटल बिहारी जैसा नारा वे मोदी के मामले में लांच नहीं कर सके।

हर- हर मोदी, घर-घर मोदी का नारा लगा, लेकिन उस पर धार्मिक संगठनों ने मोदी के खिलाफ ही आंखे तरेर लीं। जिसके बाद अंतत: मोदी को ट्वीट के माध्यम से ऐसे नारों से परहेज करने का संदेश देना पड़ा।
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चुनावी नहीं लेकिन असरदार था बाबा रामदेव का कैंपेन
कुछ समय पहले योग गुरु बाबा रामदेव ने ठंडा मतलब टायलेट क्लीनर का स्लोगन बोलना शुरू किया था। इसका असर जनता के दिलो दिमाग पर छा गया था। रामदेव अपने मंच से भी यही बात दोहराते थे।

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