मार्केट में कई ऐसी दवा हैं, जो क्लीनकल रिसर्च के प्रासेस पास करने के बाद भी मरीजों में साइड इफेक्ट करती हैं। पिछले दिनों फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने कई ऐसी दवाओं पर रोक लगा दी थी, जिनका रिएक्शन रेट काफी ज्यादा था। लेकिन, अब एक ऐसी टेक्नोलॉजी विकसित की है, जो दवाओं के जेनेटिक स्तर तक के परिणाम बताने में सक्षम है।
परीक्षण के दौरान ही सभी साइड इफेक्ट का आसानी से पता लग सकेगा। विदेशों में तो इस टेक्नोलॉजी के तहत कई दवाओं के ट्रायल चल रहे हैं और इसका फायदा भी मरीजों और फार्मास्यूटिक्ल इंडस्ट्री को भी मिल रहा है। भारत में फिलहाल इसके बारे में इतनी जागरूकता नहीं है।
मेटाब्लोमिक्स टेक्नोलॉजी पर एक रिपोर्ट पेश
पीजीआई चंडीगढ़ ने पहली बार मेटाब्लोमिक्स टेक्नोलॉजी पर एक रिपोर्ट पेश की है। इसके मुताबिक मेडिसिन की खोज और क्लीनिकल प्रासेस में मेटाब्लोमिक्स टेक्नोलॉजी एक क्रांति बन सकती है। टेक्नोलॉजी की मदद से दवा के सटीक टारगेट, दवा के इफेक्ट, उसके साइड इफेक्ट और अन्य कारकों के बारे में विस्तार से पता चलेगा। दरअसल मेटाब्लोमिक्स शरीर की कोशिकाओं और उसके आसपास के इन्वायरमेंट की एक बड़ी तस्वीर पेश करता है।
इससे परस्पर क्रियाएं और उससे जुड़ी अन्य गतिविधियों के बारे में आसानी से पता चल जाता है। जब इस तकनीक से परीक्षण होगा तो स्वाभाविक है कि इसके रिजल्ट भी काफी अच्छे होंगे। पीजीआई की इस रिपोर्ट को हाल ही में इंटरनेशनल जरनल साइंस डायरेक्ट ने भी जगह दी है। इस जनरल का इंपेक्ट फैक्टर भारतीय जरनल के मुकाबले काफी अच्छा और बेहतर है।
चार दिशा में काम करेगा मेटाब्लोमिक्स
मेटाब्लोमिक्स मुख्य रूप से चार दिशा में काम करेगा। पहला दवा के नुकसान, दूसरा दवा की क्षमता, तीसरा दवा का टारगेट और चौथा अन्य कारकों पर मुख्य रूप से काम करेगा। इस रिपोर्ट को तैयार करने में पीजीआई के फार्माकोलॉजी विभाग के डॉ. बिकास मेढी, डॉ. राकेश कुमार रूहेला, डॉ. अजय प्रकाश और डॉ. बालदीप कुमार ने योगदान दिया है।
शुरुआती दौर पर ही पकड़ लेगा साइड इफेक्ट
नई टेस्टिंग टेक्नोलॉजी की मदद से दवाओं की खोज के दौरान यह शुरुआती दौर पर ही साइड इफेक्ट को पकड़ लेगा। सबसे बड़ी बात यह है कि मेटाब्लाइटिस 400 से अधिक बीमारी के साथ जुड़ा पाया गया है। इससे दवाओं की खोज की दिशा में अच्छे परिणाम मिलते हैं।