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अमृतसरः एसजीपीसी मुख्यालय के बाहर पक्का मोर्चा, शिअद के लिए खड़ी हो गई नई पंथक चुनौती

Tue, 15 Sep 2020 11:06 AM IST
खुशबू गोयल अशोक नीर, अमृतसर

सार

  • शिअद(डी) के मुखिया सुखदेव ढींढसा लापता पावन स्वरूप मामले में बादल परिवार के साथ पंथक लड़ाई को तैयार
  • दिल्ली में मंजीत जीके इस मुद्दे पर बादल परिवार को घेर कर उन्हें सिख राजनीति से अलग-थलग करने के प्रयास में
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जत्थेबंदियों का विरोध प्रदर्शन - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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श्री गुरु ग्रंथ साहिब के लापता पावन स्वरूपों के मामले में अलग-अलग पंथक संगठनों द्वारा एसजीपीसी के मुख्यालय तेजा सिंह समुद्री हाल के बाहर पक्का मोर्चा लगाने की शुरुआत शिअद (बादल) के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है। आगामी विधान सभा और एसजीपीसी चुनाव में शिअद को इससे कई राजनितिक व धार्मिक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।
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सिखों के साथ जुड़े इस संवेदनशील धार्मिक मामले में बादल परिवार से बागी होकर शिअद (डी) का गठन करने वाले सांसद सुखदेव सिंह ढींढसा ने पंथक संगठनों के इस कदम का समर्थन किया है। ढींढसा इस मुद्दे को आगामी एसजीपीसी चुनाव में एक बड़ा मुद्दा बनाने की कवायद में जुट गए हैं। वहीं बादल परिवार से बागी होकर दिल्ली में जागो पार्टी का गठन करने वाले दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के पूर्व अध्यक्ष मंजीत सिंह जीके भी इस मामले में एसजीपीसी के वर्तमान निजाम के साथ-साथ बादल परिवार पर निशाने साध रहे हैं।

जीके बादल परिवार को दिल्ली की सिख राजनीति से अलग-थलग करने के लिए लापता पावन स्वरूपों के मामले को दिल्ली की संगत के सामने उठा रहे हैं। लापता स्वरूपों के मामले में शिअद (ब) उसी तरह पंथक कटघरे में खड़ा है, जैसे 2015 में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की बेअदबी व बहिबलकलां में गोलीबारी से दो सिख नौजवान के शहीद होने के मामले में था। इस घटना के बाद शिअद (ब) से पंथक वोट खिसक गया है, जिसके नतीजे में सुखबीर को 2017 विधानसभा चुनाव में कड़ी पराजय झेलनी पड़ी थी।
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पंथक संगठनों की मांगों को स्वीकार करना एक बड़ी चुनौती

वहीं एसजीपीसी अध्यक्ष गोबिंद सिंह लौंगोवाल द्वारा लापता पावन स्वरूपों के मामले में पंथक संगठनों की मांगों को स्वीकार करना एक बड़ी चुनौती है। लौंगोवाल पहले ही कार्यकारिणी के उस फैसले को पलट चुके हैं, जिसमें उन्होंने आरोपी एसजीपीसी अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध कानूनी और आपराधिक कार्रवाई करने के आदेश दिए थे।

लौंगोवाल इस मामले को पंथक परंपराओं के साथ हल करने के जुगाड़ में हैं, जो पंथक संगठनों को मंजूर नहीं है। पंथक संगठन आरोपियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने की मांग कर रहे हैं। अब लौंगोवाल पंथक संगठनों के दबाव में फिर अपना फैसला बदलते हैं या अपने राजनितिक आकाओं के आदेश पर कुछ अलग फैसला करते हैं, इसका इंतजार पंथ को है।

इसके साथ ही यह भी स्पष्ट है कि पंथक संगठनों के पक्के मोर्चे को हटाने के लिए यदि लौंगोवाल ने टास्क फोर्स या पुलिस बल का प्रयोग किया तो इसका खामियाजा भी शिअद को भुगतना पड़ सकता है। पहले से ही पंथक विवादों में घिरे बादल परिवार के लिए ऐसा करना आसान नहीं है। पंथक संगठनों का पक्का धरना जितना लंबा चलेगा, उतनी ही शिअद के लिए चुनौतियां पैदा होंगी।
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