हाइपरटेंशन सबसे बड़ा जोखिम, हर दूसरे मरीज में मिली बीमारी
जोखिम कारकों में हाइपरटेंशन 52% मामलों में मिला जबकि डायबिटीज 27%, हृदय रोग 12% और पहले स्ट्रोक का इतिहास 11.6% रहा। चौंकाने वाली बात यह रही कि 28% मरीजों का कोई रोग इतिहास दर्ज ही नहीं था जो रिकॉर्डिंग सिस्टम में गंभीर खामियों की ओर इशारा करता है।
इलाज भी सवालों के घेरे में
510 मरीजों से मिली जानकारी बताती है कि सिर्फ 54.3% मरीजों को ही स्ट्रोक यूनिट में इलाज मिला। एक्यूट ट्रीटमेंट केवल 31% तक पहुंच पाया। प्रिवेंटिव ट्रीटमेंट (एंटीकोआगुलेंट, एंटीप्लेटलेट, स्टेंटिंग आदि) सिर्फ 7% मरीजों को मिला। हेमरेजिक स्ट्रोक में गहन इलाज मात्र 4-5% मामलों में दर्ज हुआ। यह स्थिति बताती है कि इलाज की उपलब्धता अभी भी काफी सीमित है।
कम उम्र की डायबिटीज बढ़ाएगी स्ट्रोक का खतरा
रिपोर्ट के अनुसार 54 युवा डायबिटीज मरीजों में 80% से अधिक टाइप-1 डायबिटीज के मामले सामने आए। इनमें 84% पुरुष और 68% महिलाएं 18 वर्ष से कम उम्र की थीं। विशेषज्ञों का मानना है कि कम उम्र में डायबिटीज होना, आगे चलकर स्ट्रोक जैसे गंभीर रोगों का जोखिम कई गुना बढ़ा देता है।
लक्षण पहचानें, तुरंत पहुंचें अस्पताल
रिपोर्ट बताती है कि शहर में स्ट्रोक का बोझ लगातार बढ़ रहा है। लक्षणों को देर से पहचानना, इलाज की सीमित उपलब्धता, रिकॉर्डिंग की कमियां और तेजी से बढ़ते जोखिम कारक इसे एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बना रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार चेहरा टेढ़ा होना, बोली का लड़खड़ाना और अचानक कमजोरी जैसे लक्षण दिखते ही तुरंत अस्पताल पहुंचना ही जीवन बचाने का सबसे बड़ा उपाय है।
फैक्ट शीट
10 में से 4 मरीज को कमजोरी, हर तीसरे को लड़खड़ाती बोली
554 मरीजों में कमजोरी: 41.5%
चेहरा टेढ़ा पड़ना: 35.4%
स्लर्ड स्पीच: 18.6%
बेहोशी: 19.9%
अचानक शुरुआत: 1.1%