रिश्तों और जिस्मों के बीच के अंतर को दिखाते हुए वीरवार को टैगोर थिएटर में नाटक मुल्ल दी तीवीं का मंचन हुआ।
रूपक कला एंड वेलफेयर सोसाइटी की ओर से नार्थ जोन कल्चरल सेंटर, पटियाला और डिपार्टमेंट ऑफ कल्चरल अफेयर एंड पब्लिक रिलेशन के सौजन्य से आयोजित पांच दिवसीय के नाटक उत्सव के आखिरी दिन वीरवार को संगीता गुप्ता के निर्देशन में वीना वर्मा द्वारा लिखित नाटक का मंचन हुआ।
नाटक की शुरुआत एक कोठे के दृश्य से होती है जहां लक्ष्मी नाम की एक नाचने वाली रहती है। लक्ष्मी कई जगहों से बिक कर यहां पहुंची है।
एक दिन लक्ष्मी को एक ट्रक ड्राइवर खरीद कर ले आता है और अपने दोस्तों के सामने पेश कर देता है। लक्ष्मी को कई लोग प्रताड़ना देते है। शारीरिक रूप से उसका खूब शोषण होता है।
एक दिन ट्रक ड्राइवर से उसका एक दोस्त मघ्घर सिंह जो कि पुलिस की नौकरी से हटाया गया है, कुछ दिन अपने पास देने की बात करता है जिसके लिए वह ट्रक ड्राइवर को 1200 रुपये भी देता है।
मघ्घर सिंह, लक्ष्मी को अपने साथ अपने घर लाता है और उसे खरी खोटी सुनाता है, लेकिन लक्ष्मी मघ्घर से प्यार करने लगती है।
मघ्घर सिंह भी कहीं न कहीं लक्ष्मी को इस बीच चाहने लगता है, लेकिन वह कहता है कि वह अपने दोस्त को उसे कुछ दिन के लिए ही लाया है। इस बीच मघ्घर और लक्ष्मी का प्यार गहरा जाता है जिससे मघ्घर अंत में लक्ष्मी को अपना लेता है।
नाटक देखने आए लोगों की राय
कहानी बहुत दमदार थी। इससे पता लगता है कि एहसासों की कीमत क्या होती हैं। नाटक में अदाकारी भी अच्छी है। सबसे अच्छी बात लगी की इससे काफी कुछ सीखने को भी मिलता है।
हरताज सिंह संधू, पीएचडी स्टूडेंट
बहुत अच्छा नाटक था। नाटक के कुछ सीन दिल छू गए। लक्ष्मी ने जिस तरह से अदाकारी की है उससे किरदार की गहराई का मर्म होता है। नाटक बहुत अच्छी तरह से लिखा गया है।
सुरेश गांधी, ऑफिसर, एसबीआई पटियाला
नाटक में बहुत अच्छे तरीके से एक औरत के भाव को पेश किया है। इसकी लिखाई से एक लड़की की अहमियत का पता चलता है। नाटक बहुत अच्छा लगा।
परमजीत, म्यूजिक स्टूडेंट, पीयू
नाटक में बहुत गहराई है। बेशक पुराना हो चुका है, लेकिन काफी नया सा लगा। नाटक की कहानी को पूरे में से पूरे नंबर मिलने चाहिए। हालांकि अदाकारी थोड़ा और चुस्त होती तो मजा कुछ और था, लेकिन कुल मिलाकर नाटक बहुत अच्छा लगा।
मनजीत सिंह, जेई, पब्लिक हेल्थ