इंसानीयत का जज्बा धन-दौलत या शारीरिक गुणों से नहीं नीयत से आता है। प्रसिद्ध नाटककार और निर्देशक डॉ. साहिब सिंह की कहानी ‘अंधे हैं हम’ इसी इंसानीयत को सड़क पर गुजर-बसर करने वाले भिखारियों के बीच एक नेत्रहीन में से तलाश लाती है।
सेक्टर-16 स्थित पंजाब कला भवन में वीरवार शाम को नाटक का मंचन हुआ। हालांकि पहले ही दृश्य से यह साफ हो गया कि नाटक में रोना-धोना खूब होगा।
टक में क्रंच
कहानी मंच पर दारू पीते भिखारी भोला नाथ से शुरू होती है। उसका अंधा दोस्त शेखू पीने की वजह पूछता है। भोला कहता है आज उससे एक लड़की टकराई जिससे वह बहुत खुश है।
यह था पंच
शेखू का सपना है कि वह एक लाटरी टिकट खरीदे और अपनी किस्मत आजमा कर अपनी जिंदगी बदल ले। टिकट खरीदने के लिए उसने सौ रुपये भी जमा कर लिए हैं। वह भोला से कहता है कि वह टिकट खरीदने जा रहा है, तभी उनके पास एक और अंधा आता है। उसे उसका पोता बोझ समझ कर छोड़ गया है। शेखू और भोला को उस पर दया आती है। शेखू अपने सौ रुपये उसे देकर कहता है यह बस के किराये के लिए हैं, तू अपने घर जा।
इतना ब्रंच
एक दर्शक के लिए इसमें अच्छी अदाकारी, लाइट्स का अच्छा प्रयोग और दिल को छू लेने वाला एक दर्शन था। कसा हुआ निर्देशन होने के बाद भी कहानी पहले ही पकड़ में आ रही थी। रोने-धोने के कुछ दृश्य अनावश्यक रूप से लंबे थे।