मिलिए इस शख्स से, जो कभी पांच सौ रुपये की नौकरी किया करते था, आज एक्सपोर्ट यूनिट लगाकर 250 लोगों को रोजगार दे रखा है। ‘खुदी को कर बुलंद कर इतना कि खदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है’। डॉ. अल्लामा इकबाल की यह लाइन उत्तर प्रदेश के इटावा जिले से आकर गुड़गांव में बसे धर्मेश त्रिपाठी पर सटीक बैठती है।
500 रुपये माह की नौकरी के खातिर दिल्ली की गलियों में भटकने वाले त्रिपाठी आज गारमेंट एक्सपोर्ट यूनिट के मालिक हैं। संघर्ष के दिन ऐसे थे कि जिस सिलाई मशीन पर दिन में रोजी कमाते थे। उसी एक मीटर लंबी मशीन के नीचे रात भी गुजारते थे। एक वक्त की रोटी के आसरे वह 16 से 18 घंटे तक काम करते।
आगे बढ़ने की तमन्ना ने उन्हें टेलर से कटिंग और पैटर्न मास्टर के रूप में महारत दे दी। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था जिस शून्य से उन्होंने अपने कैरियर की शुरूआत की थी। 10 वर्ष बाद फिर उसी मुकाम पर आ गए। खाने के लाले पड़ गए और जिंदगी की नई सिरे से शुरुआत की।
हार नहीं मानते हुए उनके हौसले और उम्मीद ने नई नौकरी के साथ नई जिंगदी की जंग को जीतते चले गए। जिन साथियों के साथ कभी वह मशीन पर टेलरिंग और कटिंग करते थे उससे आगे बढ़ते पाई-पाई जोड़कर फैब्रिकेटिंग का काम शुरू किया।
वक्त और किस्मत दोनों ने धर्मेश त्रिपाठी का साथ दिया आज वह फैशन पॉथ एक्सपोर्ट यूनिट के मालिक हैं। बिनौला स्थित उनके यूनिट से 250 से अधिक लोगों का परिवार पल रहा है।