पंजाब के निजी मेडिकल कॉलेजों के एमबीबीएस और बीडीएस पाठ्यक्रम में दाखिला लेने वाले राज्य कोटा के छात्रों को भी अब मैनेजमेंट कोटा के छात्रों जितनी फीस का भुगतान करना होगा। हालांकि फिलहाल जमा कराए गए बीच के अंतर को एफडी के रूप में जमा रखा जाएगा और याचिका के अंतिम फैसले पर राज्य कोटा के छात्रों की फीस निर्भर होगी।
पंजाब की आदेश मेडिकल यूनिवर्सिटी की ओर से याचिका दाखिल करते हुए पंजाब सरकार द्वारा सीटों और फीस को लेकर बनाए गए प्रावधान को पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता यूनिवर्सिटी ने कहा कि पंजाब सरकार ने राज्य के निजी मेडिकल शिक्षण संस्थानों में 50 प्रतिशत कोटा को राज्य कोटा के तौर पर रिजर्व रखने का फैसला लिया है।
विश्वविद्यालय की ओर से कहा गया कि सर्वोच्च न्यायालय ने पी ए इनामदार बनाम महाराष्ट्र सरकार मामले में यह स्पष्ट किया है कि सरकार निजी शिक्षण संस्थानों के मामले में सीटों को लेकर इस प्रकार का कोटा नहीं बना सकते। ऐसे में पंजाब सरकार द्वारा 50 फीसदी सीटों को राज्य कोटे में रखने को सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों को खिलाफ बताया गया।
दूसरी चुनौती पंजाब सरकार द्वारा मैनेजमेंट कोटा और राज्य कोटा की फीस के बीच के फर्क को दी गई है। याचिकाकर्ता ने बताया कि जहां मैनेजमेंट कोटा में प्रथम वर्ष के छात्रों के लिए फीस 9 लाख रुपये है, वहीं राज्य कोटा में प्रथम वर्ष के छात्रों के लिए मात्र 3 लाख रुपये फीस है। ठीक इसी प्रकार का अंतर अन्य वर्षों के छात्रों के लिए है जो लगभग मैनेजमेंट कोटा के मुकाबले राज्य कोटा में 3 गुना कम है। साथी याचिकाकर्ता ने कहा कि जब सरकार द्वारा निजी संस्थान में राज्य कोटा ही लगाना गलत है तो फीस का तो सवाल ही नहीं उठता।
दोनों कोटा के बीच की फीस की एफडी के तौर पर जमा करवाना होगा
उच्च न्यायालय ने याचिका पर नोटिस जारी करते हुए पंजाब सरकार सहित अन्य को जवाब दाखिल करने के आदेश दिए हैं। इसके साथ ही उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि राज्य कोटा में प्रवेश लेने वाले छात्रों को मैनेजमेंट कोटा कितनी फीस जमा करानी होगी। दोनों कोटा के बीच की फीस का जो भी अंतर होगा उसे एफडी के तौर पर जमा कराया जाएगा और याचिका पर अंतिम फैसला आने तक याचिकाकर्ता इस एफडी को कैश नहीं करवा सकेंगे। साथ ही राज्य कोटा में प्रवेश लेने वाले छात्रों को यह पहले सूचित करना होगा कि उनके द्वारा दी जाने वाली फीस के अंतर का मामला उच्च न्यायालय में विचाराधीन है।