बिहार में भाजपा की करारी हाल के बाद हरियाणा और चंडीगढ़ में भाजपा की चिंता भी बढ़ गई है। अभी तक अपनी चाल से चल रही सरकार पर विपक्ष के जबानी हमले तो बढ़ेंगे ही, साथ ही इनेलो और कांग्रेस की सक्रियता भी बढ़ेगी। बिहार चुनाव से जहां पिछले 11 वर्षों से सत्ता से दूर इनेलो के खेमे में खुशी का माहौल है।
वहीं कांग्रेसी भी सरकार पर हावी होने की तैयारी शुरू कर चुके हैं। बिहार चुनाव में प्रचार से लौटे हरियाणा भाजपा के नेताओं में मायूसी का आलम है। एक साल से निगम और बोर्ड की लालबत्ती का इंतजार कर रहे पार्टी के नेताओं का पार्टी पर दबाव बढ़ जाएगा। विधायकों और कार्यकर्ताओं की जो सुनवाई अब तक सरकार में नहीं हो रही थी, वह भी शुरू करनी होगी।
इसे लेकर संगठन की बैठक शीघ्र होने की संभावना है। सूत्रों के मुताबिक बिहार चुनाव के बाद हरियाणा सरकार की परफार्मेंस को लेकर आलाकमान का दबाव बढ़ेगा। सरकार के एक साल के कार्यकाल को लेकर विपक्ष पहले से ही आक्रामक है। अब सूबे की सरकार को घेरने की तैयारी और तेज हो जाएगी।
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और इनेलो खेमे ने सरकार की विफलताओं को टारगेट करने के लिए पूरी तैयारी कर ली है। शीघ्र विपक्ष पूरी तैयारी के साथ फील्ड में उतरेगा। हरियाणा प्रभारी बिहार चुनाव से फुर्सत के बाद जल्द हरियाणा का दौरा कर सकते हैं।
हरियाणा की अफसरशाही में फेरबदल के संकेत
हरियाणा सरकार की समीक्षा बिहार के चुनावी नतीजों के बाद तेज हो जाएगी। परफारमेंस को लेकर जूझ रही प्रदेश सरकार समीक्षा को बेहतर करने के लिए राज्य की अफसरशाही में बड़ा फेरबदल करने की तैयारी में है। माना जा रहा है कि एक साल के कार्यकाल में जो नॉन परफार्मिंग जिलों के डीसी और एसपी हैं, उन पर गाज गिरनी तय है।
अगले एक से दो माह में मुख्यमंत्री मनोहर लाल प्रदेश की अफसरशाही को लेकर कोई ठोस कदम उठा सकते हैं। कार्यकर्ताओं से लेकर विधायक तक इस बात का रोना शुरुआत से रोते आ रहे हैं। इसके बाद कुछ विधायकों और मंत्रियों ने अपना यह दुखड़ा इस सप्ताह संघ के वरिष्ठ नेताओं के सामने भी रोया है।
कार्यकर्ताओं से अफसरों की बेहतर रिपोर्ट न आने के बाद कहीं कार्यकर्ताओं का गुस्सा बाहर न निकले, इसे देखते हुए सरकार को अफसरशाही पर नकेल कसनी होगी। सूत्रों के मुताबिक शीघ्र संघ और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच इस मामले पर मंथन होगा। इसके बाद आगे की रणनीति तैयार की जाएगी।
बिहार की जीत से कांग्रेस को संजीवनी
बिहार चुनाव की जीत ने शहर की कांग्रेस पार्टी को संजीवनी दी है जबकि भाजपा में मायूसी छा गई है। भाजपा ने बिहार चुनाव में जीत की संभावनाओं से जश्न मनाने का भी निर्णय लिया था लेकिन जश्न मना सेक्टर-35 स्थित कांग्रेस पार्टी कार्यालय में।
कांग्रेस पार्टी को लगता है कि इस चुनाव में कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा पैदा कर दी है। दिल्ली के बाद बिहार में भाजपा की हार से कांग्रेसियों का मनोबल ऊंचा हुआ है और वह अगले साल नगर निगम चुनाव में कड़ा मुकाबला देने को तैयार हो गई है।
इससे पहले कांग्रेस यह मान कर चल रही थी कि अगला नगर निगम चुनाव में भाजपा को बहुमत मिलेगा, क्योंकि कुछ प्रमुख नेता लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस पूर्व मेयर राजबाला मलिक, सतीश कैंथ, कश्मीरी देवी राणा और सतप्रकाश अग्रवाल कांग्रेस से भाजपा में शामिल हो गए। कुछ और नेता भी भाजपा में जाने की तैयारी कर रहे थे।
नए साल में होने है मेयर चुनाव
नए साल में मेयर का चुनाव भी होना है ऐसे में कांग्रेस इस कुर्सी पर फिर से कब्जा करके अपनी खुशी बढ़ाना चाहती है। वहीं भाजपा अपने पार्षदों की संख्या ज्यादा होने के दम पर मेयर की कुर्सी पर कब्जा करना चाहती है।
भाजपा की ओर से कुछ मनोनीत पार्षदों पर भी प्रभाव बनाया गया था, लेकिन बिहार चुनाव के परिणाम से अब वह प्रभाव बदल भी सकता है। नगर निगम में इस समय 9 मनोनीत पार्षद हैं जो कि मेयर चुनाव में अहम रोल अदा करेंग।