फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

चंडीगढ़ के 'रॉक लेजेंड' नेकचंद से जुड़ा चौंकाने वाला सच

Tue, 16 Jun 2015 12:27 PM IST
दीपक शाही/अमर उजाला, चंडीगढ़
विज्ञापन
विज्ञापन
नेक चंद भले ही भारत-पाक बंटवारे के बाद जम्मू आ गए थे, मगर बंटवारे का दर्द उन्हें हमेशा सताता था। उनका अपने गांव बेरिया कलां से इतना लगाव था कि एक बार जब उन्हें पाकिस्तान जाने का मौका मिला तो उनसे पूछा गया कि आप क्या देखना पसंद करेंगे।
विज्ञापन


उन्होंने झट से कहा, अपना गांव। जब उन्हें वहां ले जाया गया तो उन्हें सिर्फ मस्जिद ही बची दिखी। नेक चंद वहां से मिट्टी लेकर आए और रॉक गार्डन में लगे नीम के पेड़ की जड़ों में डाल दी। यही नहीं नेक चंद ने पाकिस्तान प्रेम और वहां की पंजाबी संस्कृति को अपनी कलाकृतियों में भी सहेजा।

यह खुलासा किया है सिविल सर्विसेज से रिटायर्ड वीपी मेहता ने। इसका जिक्र उन्होंने अपनी पुस्तक रॉक गार्डन ए विजन ऑफ क्रिएटिविटी में भी किया है। मेहता ने बताया कि रॉक गार्डन की कलाकृतियां पाकिस्तानी पंजाबी कल्चर की झलक बयां करती हैं।
विज्ञापन


इन कलाकृतियों में नेक चंद ने अपने गांव बेरिया कलां के बैसाखी पर आयोजित मेले की एक्टीविटी को संजोया है। छोटी-छोटी बतखें, बंदर, मिट्टी के बर्तन, झूले, चूड़ियां, गुडिया, सपेरा, कुंआ व ऊंट के माध्यम से उन्होंने बैसाखी के मेले और अपने गांव को दर्शाया है। नेक चंद जब पीडब्ल्यूडी में इंस्पेक्टर थे तो उन्होंने लाहौर किले के कांसेप्ट पर ही रॉक गार्डन फेज वन में छतरी वाला गुंबद बना दिया था।

पिंजौर गार्डन के मंदिरों के पत्थरों का प्रयोग
वीपी मेहता ने बताया कि एक दिन नेक पंचकूला गए। वहां उनकी नजर कौशल्या नदी में पड़े रंग-बिरंगे पत्थरों पर पड़ी। ये पत्थर पिंजौर गार्डन में बने मंदिरों के थे। क्योंकि मंदिर को जब तोड़ा गया तो कुछ हिस्सा जमीन में धंस गया और बचे बड़े पत्थरों को नदी में बहा दिया गया।

साइकिल से नेक चंद छोटे-छोटे पत्थरों को लाकर अपनी कलाकृतियां बनाते थे। इसके अलावा चंडीगढ़ के आसपास से भी उन्होंने मैटेरियल एकत्रित किया। धीरे-धीरे नेक ने अपने गांव को अपनी कलाकृतियों से जीवंत बनाया। इस बीच कई बाधाएं भी आईं, लेकिन उनकी प्रतिभा को सबने सलाम किया।
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें