पीजीआई में लंग कैंसर व फेफड़े में इंफेक्शन की डायग्नोज रिपोर्ट अब 48 घंटे में मिल जाएगी। पल्मनरी मेडिसिन में इंडोब्रोंकाइल अल्ट्रासाउंड (ईबस) नामक इस तकनीक से सिर्फ 250 रुपये में जांच की जा रही है। निजी अस्पतालों में इस जांच के बीस हजार रुपये से ज्यादा वसूले जाते हैं।
ऐसे की जाती है जांच
मरीज को बेहोश कर उसके मुंह से ईबस डाला जाता है और इससे फेफड़ों के अंदर की रियल टाइम इमेज मिलती है। करीब 48 घंटे के भीतर इसकी रिपोर्ट आ जाती है।
पल्मनरी मेडिसिन के एसोसिएट प्रोफेसर रितेश अग्रवाल ने बताया कि पहले छाती में गिल्टियां व लंग कैंसर की जांच में काफी समय लगता था।
मरीजों को एडमिट कर उनकी सर्जरी की जाती थी। लेकिन अब आसानी से पता लगा लिया जाता है। पीजीआई में आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों को मुफ्त में जांच होती है।
पीजीआई में रविवार को 28वें एनुअल अपडेट ऑन पल्मोनरी एंड क्रिटिकल केयर मेडिसिन का आयोजन किया गया। इस दौरान पल्मोनरी मेडिसिन से जुड़े कई मुद्दों पर विचार किया गया।
इंडोर पॉल्यूशन से टीबी का खतरा
पीजीआई के पल्मोनरी मेडिसिन के पूर्व एचओडी डा. एसके जिंदल ने बताया कि इंडोर पॉल्यूशन से टीबी का रिस्क फैक्टर बढ़ रहा है। चंडीगढ़ के पेरीफेरी के कुछ गांवों व इलाकों में चूल्हे पर खाना बनाया जा रहा है।
इससे उठने वाला धुआं लोगों को टीबी की ओर धकेलता है। पीजीआई के पल्मोनरी मेडिसिन के एचओडी डी बेहरा ने बताया कि स्वच्छ भारत अभियान के बाद अब लोगों को खांसी और थूकने के दौरान क्या-क्या सावधानी बरतनी होगी, उसके बारे में जल्द ही लोगों को एक कैम्पेन के तहत बताया जाएगा।
टीबी व अन्य बीमारियां सबसे ज्यादा लोगों के खांसने और थूकने से ही फैलती हैं। इसके लिए एक प्लान तैयार किया जा रहा है। जल्द ही इसके लिए पूरे भारत में एक अभियान शुरू किया जाएगा।
टीबी है तो सरकारी अस्पताल में ही दिखाएं
डा. डी बेहरा ने बताया कि यदि किसी मरीज को टीबी है तो वह सरकारी अस्पताल में ही दिखाने पर प्राथमिकता बरते। उनके मुताबिक प्राइवेट डाक्टर दवा लिखकर कर दे देते हैं और उसके बाद मरीजों का फालोअप नहीं करते।
यहीं से मर्ज गंभीर रूप लेने लगता है। डब्ल्यूएचओ व मुंबई ग्रुप के डाक्टरों ने पूरे मुंबई में एक सर्वे कराया। इसमें देखा गया कि 106 डाक्टरों ने 60 अलग-अलग प्रकार की दवाएं लिखी।
किसी में डोज कम था तो किसी में डोज ज्यादा। किसी भी मेडिसिन का कांम्बिशन ठीक नहीं था। यह हालात बताता है कि प्राइवेट डाक्टर टीबी के इलाज के प्रति गंभीर नहीं है।