'गरीबी एक बड़ा कारक है, जिससे महिलाओं के खिलाफ यौन शोषण और हिंसा के मामले बढ़ते हैं। वहीं, किसी महिला द्वारा कौमार्य (वर्जिनिटी) खोना किसी भी व्यक्ति को बलात्कार करने का लाइसेंस नहीं देता है।’ सीबीआई की विशेष अदालत की जज गगन गीत कौर ने बुधवार को जम्मू सैक्स स्कैंडल में बीएसएफ के पूर्व डीआईजी केसी पाड़ी, जम्मू पुलिस के पूर्व डीएसपी मोहम्मद अशरफ मीर समेत अन्य को सुनाई सजा के फैसले में यह बात कही।
विशेष अदालत की जज ने फैसले में पीड़िता के नाबालिग होने के मद्देनजर कहा कि कम उम्र में वर्जिनिटी खोने का मतलब यह नहीं है कि उससे कोई भी व्यक्ति को दुराचार करने का लाइसेंस मिल गया है। अदालत ने कहा कि पीड़िता गरीब थी और उसकी गरीबी का ही दोषियों ने फायदा उठाया। बीएसएफ के पूर्व डीआईजी केसी पाड़ी ने उनके द्वारा देश सेवा और 40 उग्रवादियों को मारने की दलील देते हुए सजा में नरमी की अपील की थी। लेकिन, अदालत इस बात को भी नजरअंदाज नहीं कर सकती कि दोषी ने एक नाबालिग से रेप किया है। उन पर देश और लोगों की सुरक्षा का जिम्मा था। ऐसे में उन्होंने देश और लोगों के साथ धोखा किया है।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि जम्मू पुलिस के पूर्व डीएसपी मोहम्मद अशरफ मीर ने पुलिस अधिकारी होते हुए ऐसी घिनौनी हरकत कर जनता के विश्वास को तोड़ा है। केसी पाड़ी और अशरफ मीर द्वारा दुराचार करना वह भी तब जब वह अनुशासनात्मक और सुरक्षा फोर्स से जुड़े अधिकारी हैं, तो ऐसी उम्मीद किसी से भी नहीं की जा सकती। पब्लिक का उन पर उनकी सुरक्षा का भरोसा था। ड्यूटी के दौरान बेहतरीन कार्य करना उनके ऐसे कामों को माफ नहीं कर सकती।
केसी पाड़ी द्वारा घाटी में ड्यूटी के दौरान 40 उग्रवादियों को मारने से उनकी नाबालिग से दुराचार के अपराध को नहीं ढक सकती। सभी सरकारी अधिकारियों से उम्मीद की जाती है कि वह सर्विस के दौरान अपना श्रेष्ठ प्रदर्शन दें। इसके लिए उन्हें उनकी नौकरी के अनुसार वेतन, भत्ते और अन्य सुविधाएं दी जाती हैं। ऐसे में केसी पाड़ी द्वारा किए गए अपराध को अदालत नजरअंदाज नहीं कर सकती। हालांकि, उन्होंने अपने और अपने परिवार की जान जोखिम में डालकर देश के लिए सेवाएं दी हैं।
अदालत की राय में, अपनी जान जोखिम में डालकर आतंकवादियों को मारना इस मामले में उन्हें उनके द्वारा टारगेट करना नहीं माना जा सकता। वहीं, पूर्व डीएसपी मीर, जो कि पुलिस अधिकारी रहा है, उसने जनता के विश्वास को तोड़ा है। उनके द्वारा तबीयत खराब होना, स्वास्थ्य गिरना, नौकरी जाना और परिवार की आय बंद होने को उग्रवादियों द्वारा टारगेट करने का कारण नहीं मान सकते।
वहीं, अदालत ने शब्बीर अीमद लवे, मसूद अहमद उर्फ मकसूद को दोषी ठहराते हुए फैसले में कहा कि दोनों ने एक ही दिन और एक ही जगह नाबालिग से दुराचार किया। ऐसे में वह दया या नरमी के हकदार नहीं हो सकते। वहीं शब्बीर अहमद लान्गू ने नाबालिग द्वारा उससे शादी से इनकार करने पर उससे दो बार दुराचार किया। ऐसे दोषी नरमी के हकदार नहीं हो सकता।