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चुनावी जंगः पंजाब में दांव पर ये 9 दिग्गज

Thu, 03 Apr 2014 02:51 PM IST
अखिल तलवार/अमर उजाला, चंडीगढ़
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विधानसभा में विपक्ष के नेता सुनील जाखड़ को भी हैवीवेट कैंडिडेट के रूप में कांग्रेस ने फिरोजपुर सीट से उतारा है। जाखड़ को लड़ाने का कोई विचार नहीं था। पर दिग्गजों को लड़ाने की योजना केतहत उनको भी टिकट दिया गया। पार्टी के इस भरोसे पर खरा उतरना जाखड़ के लिए बड़ी जिम्मेदारी है। इस हलके में उनके पिता बलराम जाखड़ का अच्छा प्रभाव रहा है।
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सुनील जाखड़ का मुकाबला अकाली दल के शेर सिंह घुबाया से है, जोकि राय सिख बिरादरी से संबंधित हैं। पिछली बार घुबाया ने यहां से कांग्रेस के जगमीत बराड़ को हराया था। इस हलके में ढाई लाख वोट बैंक वाली यह बिरादरी निर्णायक रोल अदा करती है।

जाखड़ के लिए राहत की बात यह है कि राणा गुरमीत सोढी उनके हक में आ गए हैं। राय सिख बिरादरी में राणा सोढी का भी अच्छा प्रभाव है। वहीं, घुबाया के प्रति लोगों की नाराजगी का भी जाखड़ को फायदा मिल सकता है।
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मनप्रीत बादल

पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब केसुप्रीमो मनप्रीत बादल के लिए यह चुनाव बेहद महत्वपूर्ण है। कांग्रेस ने पीपीपी के साथ समझौते के तहत उन्हें बठिंडा से मैदान में उतारा है। जहां उनका मुकाबला अकाली दल की बेहद मजबूत उम्मीदवार और अपने ही परिवार की बहू हरसिमरत कौर बादल से है।

उनके साथ पूरी सरकार है और मनप्रीत को सिर्फ कांग्रेस का सहारा है। पर अभी तक हलके के कांग्रेसी दिग्गज हरमिंदर जस्सी व सुरिंदर सिंगला उनके साथ नहीं निकले हैं। कांग्रेसियों की गुटबाजी मनप्रीत का नुकसान कर सकती है। 2012 में अपने ताया सीएम प्रकाश सिंह बादल से वैचारिक मतभेद के बाद पीपीपी बनाने वाले मनप्रीत को चुनाव में कुछ हाथ नहीं लगा था।

वे खुद दोनों जगह से चुनाव हार गए थे। उसकेबाद से वे हाशिए पर थे। पर कांग्रेस से समझौते के बाद उन्हें फिर ऑक्सीजन मिली है। इसलिए यह जीत उनके सियासी कैरिअर के लिए बेहद अहम है।

कांग्रेस और अकाली दल के बीच बड़ा मुकाबला

पंजाब में चुनावी बिसात बिछ चुकी है। सियासी धुरंधर सियासी शह और मात में जुट गए हैं। चुनावी महासमर में इस बार कई दिग्गज मैदान में हैं। इनमें राष्ट्रीय नेताओं के साथ-साथ सूबे के हैवीवेट लीडर भी शामिल हैं।

अभी तक मुख्य मुकाबला परंपरागत प्रतिद्वंद्वियों कांग्रेस और अकाली दल के बीच नजर आ रहा है। कांग्रेस हाईकमान ने इस बार अपने सभी दिग्गज चुनाव में उतार दिए हैं। ज्यादातर सीटों पर मुकाबला बेहद कड़ा और दिलचस्प हो गया है।

सभी दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर है। मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के परिवार के लिए भी कुछ सीटें आन-बान का सवाल बन गई हैं।

अरुण जेटली

भाजपा ने अमृतसर सीट से नवजोत सिंह सिद्धू की जगह राष्ट्रीय महासचिव अरुण जेटली को उतारा है। डिप्टी सीएम सुखबीर बादल ने यह कहकर जेटली को लड़ने का न्योता दिया था कि अमृतसर ब्लैंक चेक है। लेकिन कांग्रेस थिंक टैंक ने यहां से कैप्टन अमरिंदर सिंह को टिकट देकर सारे समीकरण बदल दिए।

एक सिख, सिद्धू की जगह हिंदू चेहरा जेटली के सामने कांग्रेस के सिख नेता कैप्टन को सिख बहुल सीट पर फायदा हो सकता है। ग्रामीण इलाकों में कैप्टन की मजबूत छवि है। अकालियों व सरकार से नाराज वर्ग उनके साथ ध्रुवीकरण कर सकता है।

कैप्टन के आते ही कांग्रेसी एकजुट हो गए। वहीं जेटली जैसे राष्ट्रीय नेता केलड़ने के बाद भी भाजपा से सिद्धू गुट नजरंदाज है। वे पूरी तरह अकालियों के भरोसे हैं। अमृतसर में अकाली दल, खासकर हलके के दिग्गज बिक्रमजीत मजीठिया की प्रतिष्ठा भी दांव पर है। इसलिए शिअद ने पूरा जोर लगा दिया है।

कैप्टन अमरिंदर सिंह

पूर्व सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह को पार्टी में उनके विरोधी प्रदेश प्रधान प्रताप बाजवा ने अमृतसर की चुनावी जंग में फंसाया। कैप्टन पहले नहीं मान रहे थे, पर हाईकमान की सख्ती के बाद वह मैदान में उतरे। रोड शो से उन्होंने जब अमृतसर में चुनावी मुहिम का आगाज किया तो सारा पंजाब उमड़ पड़ा।

इससे गदगद कैप्टन के हौसले काफी बुलंद हैं। लेकिन अरुण जेटली जैसे नेता से मुकाबला आसान नहीं, क्योंकि अकाली दल और भाजपा ने पूरा जोर लगा दिया है। कैप्टन के लिए यह लड़ाई सिर्फ चुनावी नहीं है। अगर वे जीत जाते हैं तो पार्टी में उनका कद पंजाब से लेकर दिल्ली तक काफी बढ़ जाएगा। हारने पर उल्टा भी हो सकता है। इसलिए कैप्टन योजनबद्ध तरीके से चल रहे हैं।

सबसे पहले उन्होंने हलके के नाराज नेताओं को मनाया, रूठों को एक-दूसरे केगले लगवाया। सिद्धू गुट के नाराज नेताओं का वोट बैंक भी वे अपने हक में करने में लगे हैं। जेटली और बादलों पर भी उनके हमले तीखे हो रहे हैं।

प्रताप सिंह बाजवा

प्रदेश कांग्रेस प्रधान प्रताप सिंह बाजवा गुरदासपुर सीट से दोबारा संसद पहुंचने की तैयारी कर रहे हैं। भाजपा ने उनके मुकाबले फिर बॉलीवुड स्टार विनोद खन्ना को उतारा है। बाजवा के लिए इस बार जीतना बेहद जरूरी हो गया है। क्योंकि बाजवा ने ही अपने सियासी चक्रव्यूह में कांग्रेस के दूसरे दिग्गजों को फंसाया।

उन्होंने ही हाईकमान को यकीन दिलाया कि सभी बड़े नेताओं को लड़ाया जाए तो जीत पक्की है। ऐसे में अगर बाजवा हार जाते हैं और विरोधी जीत गए तो बाजवा केसारे समीकरण बदल जाएंगे। प्रदेश कांग्रेस पर मजबूती से काबिज रहने केलिए उनका जीतना जरूरी है। पर उनके हलके में काफी नाराजगी है।

बाजवा ने सबको संतुष्ट करने केचक्कर में कार्यकारिणी में दूसरे जिलों के नेताओं को पद दे दिए। अपने रह गए, जो अब चुनाव में आंखें दिखा रहे हैं। बाजवा अभी तक रूठों को मनाने में ही लगे हैं।

विनोद खन्ना

बॉलीवुड स्टार विनोद खन्ना फिर गुरदासपुर सीट से भाजपा के टिकट पर मैदान में हैं। खन्ना इससे पहले 1998, 1999 और 2004 में यहां से जीतकर संसद में कदम रख चुके हैं। पिछली बार वे प्रताप बाजवा से मामूली अंतर से हार गए थे।

विनोद खन्ना के सियासी कैरिअर के लिए यह जीत बेहद जरूरी है। क्योंकि इस बार इस सीट पर टिकट के लिए उनका स्वर्ण सलारिया के साथ बेहद कड़ा मुकाबला हुआ। काफी जद्दोजहद चली, सब सीटें घोषित करने के बाद पार्टी ने आखिर उन पर भरोसा जताया।

अगर इस बार वे हार गए तो अगले चुनाव में सलारिया की दावेदारी उनसे कहीं ज्यादा मजबूत होगी। इसलिए खन्ना ने जोर-शोर से प्रचार शुरु कर दिया है। उन्हें कांग्रेस की गुटबाजी का फायदा तो मिलेगा, पर भाजपा की गुटबाजी नुकसान भी कर सकती है।

अंबिका सोनी

कांग्रेस ने भी अपनी एक राष्ट्रीय नेता अंबिका सोनी को इस बार आनंदपुर साहिब सीट से चुनाव मैदान में उतारा है। पंजाब से राज्यसभा सदस्य और कैबिनेट मंत्री रह चुकीं अंबिका पार्टी प्रधान सोनिया गांधी की सियासी सलाहकार भी हैं।

अंबिका का यह पहला चुनाव है। पार्टी ने जिस जीत के भरोसे उन्हें भेजा है, उस पर खरा उतरने के लिए अंबिका ने पूरा जोर लगा दिया है। बाहरी होने के कारण उन्हें हलके के सियासी समीकरणों का पता नहीं है। वहीं, उनका विरोध भी नहीं है। सभी नाराज कांग्रेसी उनके साथ चल पड़े हैं।

कांग्रेस की एकजुटता ही अंबिका को संसद तक पहुंचा सकती है। यह समझते हुए उन्होंने इसी पर फोकस रखा है। अकालियों द्वारा ड्राइंग रूम लीडर कही जाने वाली अंबिका कड़ी धूप में जमकर प्रचार कर रही हैं।

परनीत कौर

लगातार तीन बार पटियाला से जीतती आ रहीं परनीत कौर पर कांग्रेस ने फिर भरोसा जताया है। हर बार आसानी से जीतने वाली परनीत इस बार पटियाला केरण में फंसी हुई नजर आ रही हैं। उनके हलके के दो विधायकों कैप्टन अमरिंदर सिंह और साधू सिंह धरमसोत को पार्टी ने लोकसभा चुनाव में उतार दिया है।

इससे पटियाला अर्बन और नाभा हलकों की कमान संभालने वाला कोई नहीं है। हलके के बाकी कांग्रेसी दिग्गज ब्रह्म मोहिंद्रा, रणदीप नाभा अभी तक खुलकर नहीं चले हैं। आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार डॉ. धरमवीर गांधी शहरी इलाकों में पकड़ मजबूत कर रहे हैं।

उधर, कुछ समय पहले तक परनीत के खास रहे दीपइंदर ढिल्लों इस बार अकाली दल से मैदान में हैं। इससे डेराबस्सी हलका अकालियों का गढ़ बन गया है। परनीत के साथ कैप्टन अमरिंदर और राज परिवार की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हैं। उम्मीद की जा रही है कि जल्द कैप्टन खुद परनीत की चुनाव मुहिम को ऑक्सीजन देने पहुंचेंगे।
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हरसिमरत कौर बादल

बठिंडा से डिप्टी सीएम सुखबीर बादल की पत्नी हरसिमरत कौर बादल लगातार दूसरी बार जीतने के लिए चुनाव मैदान में हैं। पिछले चुनाव में उन्होंने कैप्टन अमरिंदर के बेटे रणइंदर सिंह को बड़े अंतर से हराया था। इस बार उनके मुकाबले कांग्रेस ने पीपीपी प्रधान मनप्रीत बादल को उतारा है। इससे मुकाबला दिलचस्प हो गया है।

मनप्रीत का बादल होना और इस हलके में उनका अपना आधार होना मुकाबला कड़ा बना रहा है। इस सीट पर भी बादल परिवार की प्रतिष्ठा दांव पर लग गई है। इसलिए मुख्यमंत्री और डिप्टी सीएम लगातार यहां प्रचार में जुटे हुए हैं। मनप्रीत से सियासी के साथ-साथ पारिवारिक लड़ाई भी है।

उनसे सीट हारने की कल्पना भी बादल परिवार नहीं कर सकता। पार्टी हरसिमरत को जिताने के लिए पूरी ताकत लगा रही है। तलवंडी साबो के दमदार कांग्रेसी विधायक जीत महिंदर सिद्धू को शामिल कर अकाली दल ने अपनी स्थिति मजबूत कर ली है।
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