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पंजाब में बड़े नामों पर ही भाजपा का दारोमदार

Sat, 29 Mar 2014 03:23 PM IST
अनिल भारद्वाज/अमर उजाला, चंडीगढ़
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लोकसभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी पंजाब में बड़े नामों पर ज्यादा विश्वास करती आ रही है। पिछले कई चुनाव से यह सिलसिला जारी है तथा गुरदासपुर व अमृतसर सीटों के मामले में इस बार भी यही फार्मूला अख्तियार किया गया।
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इससे स्थानीय कार्यकर्ताओं में रोष पाया जाता है, लेकिन पार्टी अनुशासन में बंधे होने की वजह से खुले तौर पर कुछ भी नहीं कहते। हालांकि, कहीं न कहीं यह रोष दिख ही जाता है।

विनोद खन्ना पर प्रयोग सफल रहा था

भाजपा प्रत्याशी के रूप में पंजाब से बड़ी हस्तियों को उतारने का सिलसिला 1998 से शुरू हुआ। उस वर्ष भाजपा ने विनोद खन्ना के रूप में सिने स्टार को अपना प्र्रत्याशी बनाकर गुरदासपुर से उतारा तथा यह प्रयोग सफल रहा।

विनोद खन्ना कांग्रेस की कद्दावर नेता सुखबंस कौर भिंडर को हराने में कामयाब रहे। 1999 में हुए लोकसभा चुनाव में भी नतीजा यही रहा।

इस प्रयोग को सफल होता देख भाजपा ने 2004 के चुनाव में गुरदासपुर में विनोद खन्ना के साथ-साथ अमृतसर से स्टार क्रिकेटर भाजपा को अपना प्रत्याशी बनाया। दोनों ही चुनाव जीत गए। इसके बाद उप चुनाव में भी सिद्धू ने अमृतसर से बाजी मारी।

2009 में भी हासिल हुई थी जीत

फिर बारी आई 2009 के लोकसभा चुनाव की। इस समय तक भाजपा के कोटे वाली होशियारपुर सीट भी परिसीमन के बाद अनुसूचित जातियों के लिए रिजर्व हो चुकी थी।

भाजपा ने यहां से किसी स्थानीय नेता या कार्यकर्ता को उतारने के बजाय 2009 के लोकसभा चुनाव से कुछ ही समय पहले रिटायरमेंट लेने वाले आईएएस अधिकारी सोम प्रकाश को टिकट दिया।

इसका विरोध भी हुआ, लेकिन उम्मीदवारी नहीं बदली गई। बेशक सोम प्रकाश ने कांग्रेस प्रत्याशी संतोष चौधरी को कड़ी टक्कर दी, लेकिन पार्टी के अंदरूनी जानकारों का कहना है कि वह भाजपा की आंतरिक गुटबाजी का शिकार होने के चलते मात्र 366 वोट से हार गए। 2009 के चुनाव में गुरदासपुर से विनोद खन्ना भी हारे, लेकिन सिद्धू अमृतसर से जीत गए।

अब मैदान में हैं अरूण जेटली जैसे दिग्गज

इसके बाद गुरदासपुर, अमृतसर और होशियारपुर में स्थानीय नेता सक्रिय हो गए और पिछले चुनाव के वक्त से ही टिकट की दौड़ में शामिल हो गए। सिद्धू का विरोध जग जाहिर था।

अमृतसर के कई नेता उनके विरोध में उतर आए। गुरदासपुर से बाबा रामदेव के शिष्य स्वर्ण सलारिया रेस में आ गए। होशियारपुर में भी सोम प्रकाश के खिलाफ लॉबी सक्रिय हो गई तथा विजय सांपला टिकट दावेदारी की लाइन में आ गए।

नतीजा होशियारपुर से पंजाब के मुख्य संसदीय सचिव सोम प्रकाश का टिकट कटा और विजय सांपला भाजपा प्रत्याशी बन गए, लेकिन होशियारपुर में स्वर्ण सलारिया को कामयाबी नहीं मिली। वहां से एक बार फिर विनोद खन्ना का बड़ा नाम काम आया।

वहीं, अमृतसर में सिद्धू का टिकट कटा तो एक और बड़ा नाम अरुण जेटली के रूप में सामने आ गया। अब यह तीनों प्रत्याशी जोर-शोर से प्रचार में जुट चुके हैं और विरोधी स्वर करीब-करीब शांत हो गए हैं।
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आप, पीपीपी के अस्तित्व में आने की यही वजह

पिछले कुछ चुनावों का अनुभव बताता है कि स्थानीय कार्यकर्ताओं या नेताओं को इस तरह से नजरंदाज किया जाना ही पीपीपी तथा आप जैसी पार्टियों के अस्तित्व में आने का कारण बनता है।

2012 के पंजाब विधानसभा चुनाव में पीपीपी का उद्भव अन्य पार्टियों के नाराज नेताओं के मिलन से ही संभव हुआ। वहीं, हाल ही में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में आप को अन्य पार्टियों से नाराज लोगों का भरपूर समर्थन मिला और यह सरकार तक बनाने में कामयाब हो गई।

भाजपा का हर कार्यकर्ता पार्टी के साथ: चुघ
पंजाब भाजपा के महासचिव तरुण चुघ ने इस बारे में बात किए जाने पर कहा कि टिकट प्राप्ति के लिए कोशिश करना हर किसी का अधिकार है। किसी एक को टिकट मिलने के बाद कुछ नाराजगी सामान्य सी बात है, लेकिन भाजपा का कोई कार्यकर्ता पार्टी अनुशासन से बाहर नहीं जाता। हर कोई पार्टी प्रत्याशियों की मदद में जी-जान से जुटा हुआ है।
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