चंडीगढ़ सीट पर चुनाव लड़ाने के लिए कांग्रेस ने अपने पुराने उम्मीदवार पवन बंसल पर सातवीं बार भरोसा जताया है। गत 13 मार्च को पार्टी ने उनकी उम्मीदवारी पर चल रहा सस्पेंस खत्म किया और चुनाव प्रत्याशी के रूप में उनके नाम की घोषणा की।
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इससे पवन बंसल के समर्थकों में तो खुशी की लहर दौड़ ही गई है, लेकिन यह उम्मीदवारी पवन बसंल के लिए एक चुनौती है, क्योंकि रेल घूस कांड में नाम आने से बंसल की काफी किरकिरी हुई। ऐसे में पवन बंसल को अपना राजनीतिक कैरियर बचाने का एक और मौका मिल गया है।
अब देखना यह है कि पवन बसंल कांग्रेस हाईकमान की उम्मीदों पर खरा उतर पाते हैं या नहीं। बंसल चार बार चंडीगढ़ के सांसद रह चुके हैं। वह 1999 से लगातार चंडीगढ़ के सांसद हैं। 1999 में चुनाव जीतने के बाद उन्होंने 2004 और 2009 में भी चंडीगढ़ से लोकसभा चुनाव जीता था। इससे पहले वह 1991 में भी चुनाव जीते थे। हालांकि 1996 और 1998 में वह चुनाव हार गए थे।
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इससे पहले बंसल 1984 से 1990 तक राज्य सभा के सदस्य भी रहे थे। अब पवन बंसल के सामने हैं तीन महिला उम्मीदवारों की चुनौती। ऐसे में लगातार तीन बार लोकसभा चुनाव जीतते आए पवन कुमार बंसल के लिए लोकसभा चुनाव 2014 की राह आसान नहीं होगी।
गुल पनाग- शुरूआत हुई पर चुनौती है कड़ी
चंडीगढ़ से चुनाव लड़ने के लिए सविता भट्टी के इंकार के बाद आम आदमी पार्टी ने अब फिल्म अभिनेत्री गुल पनाग को उम्मीदवार के रूप में उतारा है। ये चंडीगढ़ के चुनावी मैदान में एक नया चेहरा हैं।
गुल पनाग पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल एचएस पनाग की बेटी हैं। उनके पिता ने पिछले महीने ही पार्टी ज्वाइन की थी। वे पार्टी को नेशनल सिक्योरिटी मुद्दे पर सलाह देते हैं।
एचएस पनाग ने पार्टी ज्वाइन करते ही साफ कर दिया था कि वे चुनाव नहीं लड़ेंगे, लेकिन पार्टी ने उनकी बेटी को चुनाव लड़ाने का प्रस्ताव रखा, जिसे उन्होंने यक कहते हुए स्वीकार किया कि गुल को शुरू से ही जनसेवा से लगाव रहा है। अगर पार्टी उसे उम्मीदवार बनाती हैं तो उनको बेहद खुशी होगी कि उनकी बेटी चंडीगढ़ के लिए नए आयाम स्थापित करे।
अब गुल पनाग चंडीगढ़ से आम आदमी पार्टी की ओर से चुनाव लड़ रही हैं। उन्होंने चुनाव प्रचार शुरू कर दिया है। चुनाव के लिए उन्होंने महिला वोटर्स पर फोकस करने की खास रणनीति बनाई है। ऐसे में गुल पनाग अन्य पार्टी के उम्मीदवारों के लिए कड़ी चुनौती बन सकती हैं। गुल पनाग का चंडीगढ़ से गहरा नाता है। पंजाब यूनिवर्सिटी में उन्होंने मास्टर्स की डिग्री हासिल की है।
किरण खेर- शुरूआत अच्छी पर विरोधी भी हैं
चंडीगढ़ सीट पर आम आदमी पार्टी के बाद भाजपा ने भी बॉलीवुड अभिनेत्री किरण खेर का दांव खेल दिया है। पार्टी ने पुराने चेहरे पर भरोसा न करते हुए एक नए चेहरे को मैदान में उतारा है।
इस चेहरे की खास बात यह है कि यह लोगों का जाना-पहचाना, पसंदीदा चेहरा है और इस पसंद का किरण खेर को काफी फायदा हो सकता है। इनकी चुनावी रणनीति भी महिला वोट बैंक पर फोकस रह सकती है। जिस कारण अन्य उम्मीदवारों को वे कड़ी टक्कर दे सकती हैं। किरन खेर का चंडीगढ़ से पुराना नाता है।
उन्होंने चंडीगढ़ से ही पढ़ाई की और उनका पुश्तैनी घर भी सेक्टर-8 में है। पार्टी के चंडीगढ़ में होने वाले कार्यक्रमों में अक्सर किरन खेर नजर आती हैं। किरण खेर ने टिकट कन्फर्म होने के बाद बताया कि मेरे लिए यह बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। पार्टी हाईकमान के भरोसे पर खरा उतरने के लिए पूरी कोशिश करूंगी। अब थोड़े ही दिन बचे हैं, इसलिए अब काफी तैयारियां करनी है।
दूसरी तरफ किरण खेर की उम्मीदवारी को लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं में विरोध का माहौल भी बना हुआ है। ऐसे में इनकी राह की मुश्किलें भी कम नहीं होंगी।
जन्नत जहां- मिल सकता है लोगों का भरोसा
चंडीगढ़ की एकमात्र लोकसभा सीट पर चुनाव लड़ने के लिए बहुजन समाज पार्टी भी मैदान में है। पार्टी की ओर से जन्नत जहां को उम्मीवार बनाया गया है। ये चंडीगढ़ के चुनावी मैदान में एक नया चेहरा हैं। जन्नत जहां 18 मार्च को चुनाव नामांकन भरने जाएंगी।
वैसे जन्नत ने चुनाव प्रचार अभियान शुरू कर दिया है। वे डोर-टू-डोर प्रचार कर रही हैं। उनका कहना है कि चंडीगढ़ के लोग उन्हें अच्छे से जानते हैं। उनके काम को भी शहरवासियों ने देखा है। बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी उन पर काफी भरोसा जताया है।
जन्नत जहां की ताकत भी चंडीगढ़ का महिला वोट बैंक ही है। ऐसे में ये भी अन्य उम्मीदवारों के चुनौती बन सकती हैं। देखना यह है कि जन्नत पार्टी और जनता दोनों की उम्मीदों पर कितनी खरी उतरती हैं।
आम आदमी पार्टी की ओर से चंडीगढ़ की एकमात्र लोकसभी सीट पर चुनाव लड़ने के लिए सबसे पहले सविता भट्टी को उतारा गया था। सविता भट्टी जाने-माने कॉमेडियन जसपाल भट्टी की पत्नी हैं। ये चंडीगढ़ के चुनावी मैदान में एक नया चेहरा थीं।
उन्होंने जनवरी माह में आम आदमी पार्टी ज्वाइन की थी। फरवरी में उन्हें पार्टी की ओर से चुनाव टिकट दिया गया। चुनाव प्रत्याशी बनने के बाद सविता भट्टी ने चुनाव प्रचार भी शुरू कर दिया था।
उन्होंने प्रचार के लिए पूरी ताकत लगा दी थी। लोग जुड़ने लगे, प्रचार की भी चर्चा भी होने लगी थी, लेकिन इस बीच वालंटियर उनसे दूर होने लगे। उनके खिलाफ अंदर खाते एक मुहिम चल पड़ी। इससे आहत होकर सविता भट्टी ने चुनाव टिकट लौटा दिया और चंडीगढ़ से चुनाव लड़ने से इंकार दिया।
इसका मुख्य कारण था, पार्टी कार्यकर्ताओं द्वारा सविता भट्टी को समर्थन न करना। कार्यकर्ताओं ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया था और उनके चुनाव प्रचार पर सवाल खड़े कर दिए थे। बात जसपाल भट्टी तक पहुंच गई। सवाल उठा कि प्रचार के दौरान पार्टी का नाम कम और जसपाल भट्टी नाम ज्यादा लिया जा रहा है। इससे भट्टी को काफी धक्का पहुंचा और कहीं न कहीं नाम वापस लिए जाने के पीछे यह भी एक प्रमुख कारण रहा।
आम आदमी पार्टी की ओर से लोकसभा चुनाव लड़ने से मना करने के बाद सविता भट्टी ने कहा कि उन्होंने सिर्फ दावेदारी छोड़ी है पार्टी नहीं। पार्टी व उनका विजन एक है। वे पार्टी के साथ काम करती रहेंगी। पार्टी के उम्मीदवार को समर्थन भी देंगी। ये बात उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस में कही। वैसे अगर सविता भट्टी चुनाव लड़ती तो वे अन्य पार्टी के उम्मीदवारों के लिए कड़ी चुनौती बन सकती थीं।