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31 साल पहले भी चौटाला परिवार में छिड़ी थी जंग, अब ऐसे दोहराया गया इतिहास, वजह बने दुष्यंत

Fri, 12 Oct 2018 09:55 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
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चौटाला परिवार
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चौटाला परिवार में जिस तरह की जंग आज देखने को मिल रही है, 31 साल पहले भी ऐसा ही एक विवाद हुआ था। इतिहास फिर दोहराया गया और इसकी वजह बने दुष्यंत चौटाला। इन्हें इनेलो सुप्रीमो ओमप्रकाश चौटाला ने पार्टी से निलंबित कर दिया है। वहीं उनके चाचा अभय चौटाला को कमान सौंप दी गई है।
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दुष्यंत को लिखित में नोटिस भेजकर एक सप्ताह में जवाब देने को कहा गया है। चौटाला ने अपने पोते और हिसार सांसद दुष्यंत को पार्टी के सभी पदों से भी हटा दिया है। इससे पहले वीरवार को सुबह चौटाला ने पार्टी की युवा इकाई और छात्र संगठन इनसो कि राष्ट्रीय और प्रदेश कार्यकारिणी को भंग करने का फैसला लिया था।

सात अक्तूबर की गोहाना में हुई सम्मान दिवस रैली के दौरान विपक्ष के नेता अभय सिंह चौटाला के खिलाफ हुई हूटिंग के बाद चौटाला द्वारा शुरू किया गया ऑपरेशन क्लीन आने वाले दिनों में पार्टी में और भी बहुत सारे विकेट गिरा सकता है।
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ये रही निलंबन की वजह

सांसद दुष्यंत चौटाला
गोहाना रैली में पार्टी की इन दोनों युवा शाखाओं को अनुशासनहीनता के कारण और पार्टी के आदर्शों के खिलाफ काम करते हुए पाया गया था। गोहाना में 7 अक्तूबर को हुई जननायक चौधरी देवी लाल के जन्मदिवस सम्मान समारोह रैली में पार्टी की युवा इकाई पूरी तरह अपनी भूमिका निभाने में असफल रही है।

दूसरी तरफ यह पाया गया था कि इनसो पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल है। अभय चौटाला के खिलाफ हुई हूटिंग ओम प्रकाश चौटाला को बर्दाश्त नहीं हुई है। इनसो पर यह आरोप भी है कि पार्टी विरोधी शक्तियों से मिलकर षड्यंत्र करते हुए उपरोक्त रैली में गड़बड़ी फैलाने की कोशिश की गई और इनेलो की साख को बट्टा लगाने का प्रयास किया गया है।

इससे खफा होकर ही पार्टी सुप्रीमो ओम प्रकाश चौटाला ने सख्त कदम उठाते हुए पार्टी की नई कार्यकारिणी घोषित कर इनसो और यूथ विंग को भंग कर दिया है। साथ ही इस बात का साफ संदेश दिया है कि अभय चौटाला ही उनके राजनीतिक वारिस होंगे और पार्टी में अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं होगी।

चौधरी देवीलाल की राह पर ओम प्रकाश चौटाला

Om Prakash Chautala
इतिहास अपने आप को दोहराता है। इंडियन नेशनल लोकदल आज उसी दोराहे पर खड़ी है, जिस पर वर्ष 1987 में चौधरी देवीलाल खड़े थे। देवीलाल ने सख्त निर्णय लेते हुए पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला को अपना राजनीतिक वारिस घोषित किया था। अब चाचा भतीजे के बीच हुए विवाद के बाद बड़े चौटाला ने अभय को आगे किया है।

विधानसभा चुनाव की दहलीज पर खड़ी हरियाणा की जनता को स्पष्ट करना भी जरूरी था कि राजनीतिक वारिस कौन होगा। फिलहाल हिसार से सांसद दुष्यंत चौटाला ने इस पूरे घटनाक्रम पर चुप्पी साधी है, लेकिन विधानसभा चुनाव से पहले चौधरी देवीलाल की विरासत की लड़ाई आगे आ सकती है। जेबीटी भर्ती घोटाले में हुई सजा के बाद से अजय चौटाला और ओम प्रकाश चौटाला के जेल जाने के बाद अभय चौटाला ही पार्टी की कमान संभाल रहे हैं।

2014 में 19 विधायकों के साथ विधानसभा में पहुंचे अभय को नेता प्रतिपक्ष बनने का मौका मिला और संघर्ष के समय में पार्टी के चेहरे के तौर पर काम किया। भविष्य में ऊंट किस करवट बैठेगा यह कहना मुश्किल है, लेकिन विधानसभा चुनाव से पहले इनेलो के लिए दोनों धड़ों को मना कर रखना मुश्किल होगा।
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ऐसे चलाया था ताऊ देवीलाल ने राज

हरियाणा के पूर्व CM चौटाला
चौधरी देवीलाल दो भाई थे। बड़े भाई थे चौधरी साहिबराम और छोटे देवीलाल। पहला चुनाव चौधरी साहिबराम ने ब्रिटिश काउंसिल का लड़ा और जीते। देवीलाल ने स्वतंत्रता सेनानी के तौर पर लड़ाई लड़ी 1952 में देवीलाल सिरसा से विधायक का चुनाव लड़े और जीते। उसके बाद लगातार जीतते रहे।

1971 में दो सीटों पर लड़ा था देवीलाल ने चुनाव
संघर्ष का एक दौर ऐसा आया कि चौधरी देवीलाल ने 1971 में में आदमपुर से भजनलाल और तोशाम से चौधरी बंसीलाल के खिलाफ चुनाव लड़ा और दोनों जगह से चुनाव हारे। हौसला थोड़ा कम हुआ लेकिन 1971 में रोड़ी विधानसभा में उपचुनाव हुआ फिर लड़े और फिर जीते। उसके बाद इमरजेंसी में जेल गए।

1977 में पहना मुख्यमंत्री का ताज
ताऊ देवीलाल ने 1977 में मुख्यमंत्री का ताज पहना और 1982 में ऐसा जादू चलाया कि 90 में से 85 सीटों पर भाजपा और अकाली दल के सहयोग से जीत हासिल की।  1987 में न्याय युद्ध की शुरुआत की। बुढ़ापा पेंशन जैसे एतिहासिक फैसले लागू किए। बाद में अन्य राज्यों को इस पेंशन के फैसले का अनुसरण करना पड़ा।

1989 में बने उपप्रधानमंत्री
1989 में चौधरी देवीलाल केंद्र की राजनीति में चले गए। उप प्रधानमंत्री बनने के साथ ही रणजीत सिंह और ओम प्रकाश चौटाला में विरासत की जंग शुरू हो गई। ऐसे में देवीलाल ने कड़ा निर्णय लिया और ओम प्रकाश चौटाला के हाथ में पार्टी की बागडोर सौंपी। उनका मानना था कि ओम प्रकाश चौटाला एक कुशल प्रशासक होंगे और पार्टी को आगे बढ़ाएंगे।
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