शिरोमणि अकाली दल पंथक मुद्दों को लेकर बुरी तरह उलझता रहा है, एक के बाद एक मामला अकाली दल के गले की फांस बनता जा रहा है। कुंवर विजय प्रताप की शिकायत कर तबादला करवाना और नकोदर कांड से शिअद सुप्रीमो सुखबीर बादल व अकाली प्रत्याशी चरणजीत सिंह अटवाल का पल्ला झाड़ना नए मामले हैं, जिसमें अकाली दल घिर गया है।
वहीं खडूर साहिब में बीबी परमजीत कौर खालड़ा के खिलाफ बीबी जागीर कौर को उतारने के फैसले से भी अकाली दल पर दबाव बढ़ने लगा है, क्योंकि अकाली दल टकसाली ने अपने उम्मीदवार जेजे सिंह का नाम वापस ले लिया है। बहिबल कलां और कोटकपूरा गोलीकांड मामले में अकाली दल की तरफ से कोई कार्रवाई नहीं की गई और जस्टिस जोरा सिंह आयोग की रिपोर्ट पर भी कार्यवाई नहीं की गई। इससे पंथक लोग शिअद से पूरी तरह कट गए।
अकाली दल की तरफ से 2017 में डेरा सिरसा प्रमुख गुरमीत राम रहीम से समर्थन लेने से भी पंथक नेता व वोट बैंक पार्टी से नाराज था। 2015 में डेरा प्रमुख को श्री अकाल तख्त से माफी और फिर यूटर्न को लेकर भी अकाली दल का विरोध लोगों ने किया। पंजाब में कैप्टन सरकार बनने के बाद बहिबल कलां गोलीकांड की जांच के लिए जस्टिस रंजीत सिंह आयोग का गठन किया गया, जिस पर अकाली दल ने आरोप लगाकर रोकने की कोशिश की।
बाद में सरकार की तरफ से एसआईटी का गठन किया गया, जिसमें कुंवर विजय ने इस केस की परत दर परत खोलनी शुरू कर दी। इसके बाद पूर्व एसएसपी चरणजीत शर्मा के अलावा आईजी परमराज उमरानंगल को गिरफ्तार किया गया और अकाली नेता मनतार बराड़ भी इस मामले में जमानत लेने के लिए अदालत की शरण में चला गया। मामले में सांसद नरेश गुजराल ने आयोग से शिकायत कर कुंवर विजय प्रताप का तबादला करवा दिया गया। यह दांव अकाली दल को उल्टा पड़ गया और पार्टी बैकफुट पर चली गई।
नकोदर कांड में अटवाल और सुखबीर के अलावा दरबारा सिंह गुरु घिरे
1986 में नकोदर में श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी के बाद रोष प्रकट करने पहुंची संगत पर पुलिस ने फायरिंग की, जिसमें चार युवक शहीद हो गए। इस मामले में जस्टिस गुरनाम सिंह आयोग का गठन किया गया, 33 साल बाद भी इसमें इंसाफ नहीं मिला। अकाली दल की तीन बार सरकार आ चुकी है, लेकिन फिर भी आरोपियों पर कार्रवाई नहीं हुई। उल्टा उस समय के दोनों आरोपी अकाली दल के नेता बन गए।
तत्कालीन डीसी दरबारा सिंह गुरु को फतेहगढ़ साहब से टिकट दी गई। 2001 में जस्टिस गुरनाम सिंह की रिपोर्ट विधानसभा में पेश हुई, उस समय स्पीकर चरणजीत अटवाल थे। अटवाल ने कहा कि उनका काम विधानसभा में रिपोर्ट लाना था, कार्रवाई करना तो सरकार का काम था। उस समय अकाली दल की सरकार थी और सुखबीर बादल ने सोमवार को जालंधर में यह कहकर नए विवाद को जन्म दिया है कि उनको तो इस मामले का पता ही नहीं है।
खालड़ा के खिलाफ अकाली उम्मीदवार उतारना
अकाली दल खुद को पंथक पार्टी होने का दावा करती है लेकिन अकाली दल की तरफ से निर्दोष सिखों की हत्या के खिलाफ आवाज उठाने वाले जसवंत सिंह खालड़ा की पत्नी परमजीत कौर खालड़ा के खिलाफ बीबी जागीर कौर को मैदान में उतारा है। इससे विवाद खड़ा होने लगा है कि अगर अकाली दल सिखों की हितैषी पार्टी है तो खालड़ा के खिलाफ उम्मीदवार क्यों उतारा।
अकाली दल को अपने इतिहास की जानकारी नहीं है
एसजीपीसी की सदस्य बीबी किरणजोत कौर का कहना है कि अकाली दल की नई लीडरशिप को 1980 के दशक की जानकारी नहीं है। जसवंत सिंह खालड़ा तो अकाली दल के मानवाधिकार विंग के प्रधान थे। नई लीडरशिप जो भी फैसला लेती है, उसको पुराने इतिहास को याद करना चाहिए।