हरियाणा के चुनावी दंगल में आधी आबादी पर पुरुष आज भी प्रधान हैं। क्योंकि कोई भी दल लोकसभा चुनाव में महिलाओं को 33 प्रतिशत सीटें नहीं देता। एक या दो टिकट देकर ही महिला नेताओं को चुप करा दिया जाता है। इस बार भी कुछ ऐसा ही होने जा रहा है। भाजपा ने दस में से आठ सीटों पर चेहरे घोषित कर दिए हैं। दो सीटों पर घोषणा बाकी है, जिनमें एक भी महिला उम्मीदवार नहीं होगी। आठ सीटों पर सात पुरुष और एक महिला उम्मीदवार सिरसा से सुनीता दुग्गल उतारी गई हैं।
कांग्रेस ने अभी अपने उम्मीदवारों की घोषणा नहीं की है, लेकिन अंबाला से कुमारी सैलजा और भिवानी से श्रुति चौधरी का चुनावी रण में ताल ठोकना तय है। ऐसे में कांग्रेस ही ऐसी पार्टी होगी, जिससे सबसे अधिक दो महिला उम्मीदवार मैदान में उतरेंगी। इनेलो, आप, जजपा व बसपा-लोसुपा से भी महिला उम्मीदवारों में महिलाएं कम संख्या में, या न के बराबर होंगी। पिछले 40 वर्षों में केवल पांच महिलाएं ही लोकसभा चुनाव की नैया पार कर पाई हैं, वह भी पारिवारिक सियासी रसूख और राष्ट्रीय दलों की टिकट के बल पर।
आजाद उम्मीदवार के तौर पर कोई महिला आज तक हरियाणा से संसद का रास्ता नहीं तय कर पाई है। कांग्रेस से सबसे ज्यादा तीन बार व इनेलो से दो बार महिला सांसद बनीं। कांग्रेस से संसद पहुंचने वालों में कुमारी सैलजा के अलावा श्रुति चौधरी भी हैं। भाजपा की सुधा यादव और इनेलो से 1998 में प्रो. कैलाशो देवी व 1999 में भी कैलाशो देवी लोकसभा पहुंचीं। प्रदेश से पहली महिला सांसद बनने का गौरव चंद्रावती के नाम है। उन्होंने भारतीय लोक दल की टिकट पर 1977 में चुनाव जीता था। करनाल, रोहतक, हिसार, फरीदाबाद, गुरुग्राम और सोनीपत की जनता ने आज तक एक बार भी किसी महिला को संसद में नहीं भेजा है।