केंद्र की सियासत में हरियाणा की महिलाओं का दखल कम ही रहा है। सूबे की कुछेक महिलाएं ही केंद्र की सियासत का हिस्सा बनीं और प्रदेश का नाम राजनीतिक फलक पर चमकाया। ऐसा नहीं है कि हरियाणा की महिलाओं में नेतृत्व क्षमता की कमी है। इसकी बड़ी वजह यह है कि अधिकतर राजनीतिक दलों ने लोकसभा चुनाव में महिलाओं को मौका देने की ज्यादा हिम्मत ही नहीं दिखाई।
कुछेक दलों ने टिकट दी, अधिकतर बार महिलाएं आजाद ही खड़ी हुईं। इस बार भी वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में हरियाणा के कुल 223 प्रत्याशियों में से 11 महिलाएं मैदान में हैं। इनमें भी बड़े राष्ट्रीय दलों ने सिर्फ 4 महिलाओं को ही मैदान में उतारा है। जबकि 7 महिलाएं राज्यस्तरीय दलों की या आजाद प्रत्याशी हैं।
इन महिलाओं में 1 महिला प्रत्याशी अंबाला, 3 महिला प्रत्याशी कुरुक्षेत्र, 1 महिला प्रत्याशी सिरसा, 1 महिला प्रत्याशी रोहतक, 2 महिला प्रत्याशी भिवानी-महेंद्रगढ़, 1 महिला प्रत्याशी फरीदाबाद व 2 महिला प्रत्याशी सोनीपत से मैदान में हैं।
1966 में हरियाणा गठन से पहले संयुक्त पंजाब के समय 1957 में सुभद्रा जोशी करनाल सीट से कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ी थीं। सुभद्रा जोशी देश की बड़ी स्वतंत्रता सेनानी और वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में महिलाओं का नेतृत्व करने वाली महिला थी। संयुक्त भारत के सियालकोट की मूल निवासी सुभद्रा जोशी करनाल से चुनाव जीतीं और सांसद बनीं।
उसके बाद वह करनाल समेत विभिन्न राज्यों की अलग-अलग सीटों से चार बार सांसद बनीं। सुभद्रा जोशी के अलावा पांच और महिला नेत्रियों ने संसद में हरियाणा का प्रतिनिधित्व किया। इनमें विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, पूर्व केंद्रीय मंत्री कुमारी सैलजा, पुडुचेरी की पूर्व उपराज्यपाल चंद्रावती, पूर्व मंत्री श्रुति चौधरी, सुधा यादव व कैलाशो सैनी शामिल हैं।
सुषमा स्वराज ने तो विदेश मंत्री बनकर हरियाणा का नाम अंतरराष्ट्रीय फलक तक चमकाया है। उन्होंने लंबी राजनीतिक पारी खेली और भाजपा सरकार में कई विभागों की मंत्री और लोकसभा में विपक्ष की नेता भी रहीं। मौजूदा मोदी सरकार में विदेशी मंत्री की हैसियत से उन्होंने दुनिया में मोदी के साथ अपनी धाक जमाई है। दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री बनने का रिकार्ड भी सुषमा के नाम है।
चार बार सांसद रहीं कुमारी सैलजा भी केंद्र में मंत्री रही हैं। वे दो बार सिरसा से और दो बार अंबाला से सांसद बनीं। अभी वह राज्यसभा की सदस्य हैं और पार्टी ने उन्हे इस बार फिर अंबाला से चुनावी रण में उतारा है। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री बंसीलाल की बहुरानी किरण चौधरी आज बंसीलाल परिवार की राजनीतिक वारिस हैं।
वह 2009 में भिवानी-महेंद्रगढ़ सीट से सांसद बनकर लोकसभा में गई थीं। आज विधानसभा में सीएलपी की लीडर हैं और उनकी बेटी इसी परंपरागत सीट से इस बार कांग्रेस की प्रत्याशी हैं। 1997 में चंद्रावती भिवानी की सीट से चुनाव जीतकर लोकसभा की दहलीज पर पहुंचीं। बाद में उन्हें पुडुचेरी की उप राज्यपाल बनने का मौका भी लिया था।
उन्होंने भी रजनीति में हरियाणा का नाम देश में रोशन किया था। पेशे से लेक्चरर रही भाजपा नेत्री डा. सुधा यादव ने वर्ष 1999 में चुनाव लड़ा था और वह जीती थीं। उनके पति कारगिल युद्ध में शहीद हो गए थे। सुधा ने वर्ष 2004 और 2009 का भी चुनाव लड़ा था। लेकिन वह जीत नहीं पाई। कैलाशो सैनी इनेलो की टिकट पर दो बार लोकसभा सांसद बन चुकी हैं। लेकिन अभी वह कांग्रेस में हैं।
राजनीतिक पार्टियों को टिकटों में महिलाओं को कम से कम एक तिहाई हिस्सा देना चाहिए। हरियाणा की महिलाओं में नेतृत्व क्षमता की कमी नहीं है। लेकिन उन्हे ज्यादा मौका ही नहीं दिया गया। दलों को अपनी ये सोच बदलनी चाहिए। महिलाओं को राजनीति में और ज्यादा मौका दिया जाना चाहिए।
- जेएस नैन, राजनीतिक मामलों के जानकार