हरियाणा में कुछ सीटें ऐसी हैं, जहां समीकरणों के साथ-साथ कई दिग्गज नेताओं का प्रभाव भी चुनावी नतीजों पर असर डालता है। संबंधित इलाकों के लिए इन दिग्गजों द्वारा करवाए गए विकास कार्य हों या फिर उनका असर, ये दोनों ही संबंधित सीट के नतीजों पर अपनी छाप छोड़ते हैं। सूबे में इन दिग्गजों को इलाकों का ‘चौधरी’ तक भी कहा जाने लगता है।
इस बार के लोकसभा चुनाव में भी प्रदेश के कई दिग्गजों की साख अब कुछ सीटों की जीत-हार के साथ जुड़ गई है। संसदीय क्षेत्र करनाल में हार-जीत की प्रतिष्ठा सीधे हरियाणा के मुख्यमंत्री सीएम मनोहर लाल से जुड़ी है। इस संसदीय सीट में 9 विधानसभा क्षेत्र पानीपत शहरी, इंद्री, समालखा आजाद, नीलोखेड़ी, घरौंडा, पानीपत ग्रामीण, असंध, करनाल व इसराना शामिल हैं।
इन नौ विधानसभा क्षेत्रों में से सीएम खुद करनाल से विधायक हैं और सात अन्य पर भाजपा का ही कब्जा है। सिर्फ एक सीट समालखा आजाद प्रत्याशी के पास है। इतना ही नहीं करनाल से सांसद अश्वनी चोपड़ा भी भाजपा के ही हैं। ऐसे में करनाल संसदीय सीट को फिर से जीतना भाजपा और सीएम के लिए प्रतिष्ठा का सवाल भी बनता है।
रोहतक संसदीय सीट पर फिलहाल कांग्रेस का कब्जा है और यहां से सांसद दीपेंद्र हुड्डा दो बार के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के बेटे हैं। ऐसे में यह सीट हुड्डा पिता-पुत्र की साख से जुड़ी है। क्योंकि यह सीट दोनों का गृहनगर भी है। इस संसदीय क्षेत्र में भी 9 विधानसभा क्षेत्र हैं। इनमें से छह सीटों पर कांग्रेस और तीन सीटों पर भाजपा विधायक काबिज हैं।
गढ़ी सांपला किलोई विधानसभा से तो पूर्व सीएम हुड्डा खुद विधायक हैं। ऐसे में हुड्डा चाहेंगे कि वह अपने घर में अपनी ‘चौधराहट’ काबिज रखें। कुरुक्षेत्र से वैसे तो सांसद राजकुमार सैनी है। लेकिन भाजपा से बगावत के बाद सैनी अपनी अलग पार्टी लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी बनाकर इस बार चुनावी रण में हैं। ऐसे में इस सीट पर फिर जीतना सैनी के लिए बड़ी चुनौती रहेगा।
फिलहाल इस चुनाव के मद्देनजर सैनी की पार्टी ने बसपा के साथ गठबंधन किया है। उधर भाजपा को भी इस सीट पर कब्जा बरकरार रखना चाहेगी।
हिसार में इस वक्त सांसद दुष्यंत चौटाला हैं। वह इनेलो के सिंबल पर सांसद का चुनाव जीते थे, लेकिन आज इनेलो से निष्कासित होकर नया सियासी दल जननायक जनता पार्टी (जजपा) का गठन कर चुनावी रण में हैं। अब दुष्यंत के लिए अपनी इस सीट को बचाकर रखना चुनौती है, तो वहीं इनेलो को भी हिसार फिर से जीतकर अपना दम दिखाना होगा।
इसी तरह सिरसा सीट इनेलो-अकाली गठबंधन के पास है। लेकिन जिस तरह से इनेलो बिखराव के कगार पर है, इस सीट पर कब्जा बरकरार रखने के लिए पार्टी को कड़ी मशक्कत करनी पड़ सकती है। चूंकि इस वक्त इनेलो का झंडा विधायक अभय चौटाला के हाथ है, इसलिए हिसार और सिरसा सीट की जीत उनकी साख से जुड़ी है।