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लोकसभा चुनाव 2019: दूसरी बार हुआ ऐसा, पर संजय टंडन को क्यों नहीं मिला टिकट, दो बड़े कारण

Wed, 24 Apr 2019 12:34 PM IST
खुशबू गोयल रिशु राज सिंह, अमर उजाला, चंडीगढ़
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संजय टंडन
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लगातार दूसरी बार ऐसा हुआ कि संजय टंडन को मायूस होना पड़ा, लेकिन आखिर उन्हें भाजपा ने इस बार चुनाव टिकट क्यों नहीं दिया। इसके पीछे दो बड़े कारण बताए जा रहे हैं। भाजपा में प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर करीब 9 साल काम करने के बावजूद संजय टंडन पर पार्टी हाईकमान ने विश्वास नहीं जताया और टिकट वर्तमान सांसद किरण खेर को दे दिया।
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पिछले कई सालों से टिकट के इंतजार में संजय टंडन को दूसरी बार निराशा हाथ लगी है। सूत्रों की मानें तो टंडन को टिकट नहीं मिलने के पीछे सबसे बड़ा कारण पार्टी के अधिकारियों के साथ कई मुद्दों पर रही नाराजगी है। टिकट की घोषणा के चंद मिनट बाद ही टंडन ने ट्वीट करके सांसद खेर को बधाई और शुभकामनाएं दीं लेकिन खेर को टिकट मिलने से टंडन गुट में मायूसी छा गई है।

बताया जा रहा है कि संजय टंडन को टिकट दिलवाने में हरियाणा के मुख्यमंत्री सीएम मनोहर लाल के साथ केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल काफी प्रयासरत थे।

 

पहला कारण : साल 2018 का मेयर चुनाव

पार्टी सूत्रों का कहना है कि साल 2018 मेयर चुनाव में पार्टी हाईकमान ने देवेश मोदगिल का नाम सुझाया था, जिसका टंडन ग्रुप के पार्षदों ने विरोध जताया था। विरोध स्वरूप भाजपा की पूर्व मेयर आशा जसवाल ने आजाद नॉमिनेशन भर दिया। उनके साथ पार्षद रविकांत, वर्तमान मेयर राजेश कालिया, जगतार जग्गा, सतीश कैंथ, राजेश गुप्ता, शक्ति प्रकाश देवशाली, फरमीला देवी और विनोद अग्रवाल खुलकर सामने आए थे।

ये सभी पार्षद टंडन गुट के माने जाते हैं। इससे पार्टी की राष्ट्रीय स्तर पर काफी किरकिरी हुई थी। राष्ट्रीय अखबारों ने इस खबर को सुर्खियां बनाई थीं। इस घटना के बाद चंडीगढ़ के प्रभारी प्रभात झा ने संजय टंडन को निर्देश दिया कि वे आशा जसवाल को मनाएं, लेकिन टंडन ने मना कर दिया। इससे टंडन और प्रभारी प्रभात झा व संगठन मंत्री दिनेश कुमार से ठन गई थी।

दूसरा कारण : पार्टी की गुटबाजी में खत्म करने में नाकाम
किरण खेर के जीतने के बाद से पांच साल में पार्टी दो भागों में बंटी नजर आई। एक गुट सांसद किरण खेर का तो दूसरा संजय टंडन का। पांच सालों में कम ही दोनों एक साथ मंच साझा करते हुए दिखे। अक्सर दोनों के बीच गुटबाजी खबरें बनती रहीं। संजय टंडन को काफी अनुभवी नेता माना जाता रहा है।

ऐसे में पार्टी आलाकमान उनसे उम्मीद लगाए बैठा था कि वे अपने कौशल से पार्टी की गुटबाजी को खत्म करेंगे, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। पिछले साल सांसद किरण खेर के करीबी सहदेव सलारिया का मामला काफी चर्चा में था। इस मामले को तूल देने का आरोप संजय टंडन पर लगा था। पिछले दिनों विजय संकल्प रैली में सत्यपाल जैन को न बुलाना और एक अन्य कार्यक्रम के दौरान एक ही गुट के पार्र्षदों को मंच पर जगह देने का मामला भी हाईकमान तक पहुंचा था।

 
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...लेकिन आलाकमान ने टंडन की इन बातों पर नहीं दिया ध्यान

पार्टी के संगठन को तैयार करने का श्रेय संजय टंडन को ही जाता है। टंडन की वजह से बीजेपी ने चंडीगढ़ में एक भारी-भरकम संगठन तैयार किया है। नोटबंदी भाजपा सरकार की एक बड़ी विफलता मानी जा रही थी। उस वक्त बीजेपी के खिलाफ लोगों में जबरदस्त गुस्सा था। उसके कुछ ही महीनों बाद चंडीगढ़ में नगर निगम के चुनाव हुए। पार्टी ने संजय टंडन के नेतृत्व में 22 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिनमें से 20 सीटों पर बीजेपी ने बाजी मारी थी।

इन जीत की तारीफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी की थी। इसके अलावा टंडन के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद से भाजपा शहर में कोई चुनाव नहीं हारी। यह टंडन की ही सफलता है कि वे पिछले नौ साल से प्रदेश अध्यक्ष के पद काबिज हैं। साल 2018 में उनका दूसरा कार्यकाल खत्म हो गया था, लेकिन पार्टी ने उन पर विश्वास जताया और चुनाव तक कार्यकाल बढ़ा दिया है।

मैं किरण खेर को बधाई देता हूं। केंद्रीय चुनाव समिति का निर्णय का स्वागत करता हूं। पार्टी के कार्यकर्ता नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए एक बार फिर से मेहनत करेंगे।  
- संजय टंडन, प्रदेश अध्यक्ष, भाजपा

मैं पार्टी का अनुशासित सिपाही हूं। जब भी पार्टी ने चुनाव लड़ने के लिए कहा तो मैं लड़ा, और जब नहीं कहा तो नहीं लड़ा। पार्टी का निर्णय मान्य है और भाजपा एकजुट होकर चुनाव मैदान में उतरेगी।
- सत्यपाल जैन, पूर्व सांसद
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