पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के साथ 55 साल तक साथ काम करने के बाद उनके बेटे सुखबीर बादल की नीतियों के विरोध में नया अकाली दल बना। सांसद रंजीत सिंह ब्रह्मपुरा, पूर्व सांसद डॉ. रतन सिंह अजनाला और सेवा सिंह सेखवां ने रविवार को इस नए अकाली दल के गठन की घोषणा कर दी। अपने 98 साल के इतिहास में अकाली दल कई बार टूटा।
सबसे पहले 1960 के दशक में मास्टर तारा सिंह और संत फतेह सिंह के बीच पैदा हुए विवाद में दल दोफाड़ हुआ था। उस समय शिरोमणि कमेटी की प्रधानगी को लेकर हुआ विवाद अकाली दल में विभाजन पैदा कर गया था। अपने 98 वर्ष के राजनीतिक सफर के दौरान अकाली दल की लीडरशिप कई बार अपने राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए आपस में उलझी। दो टुकड़े हुए अकाली दल को एक करने के लिए श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदारों ने हमेशा भूमिका निभाई।
आतंकवाद के दौरान शिरोमणि अकाली दल (लौंगोवाल) बना
आतंकवाद के दौरान शिरोमणि अकाली दल (लौंगोवाल) बना, जिसके अध्यक्ष हरचंद सिंह लौंगोवाल थे। इसके पहले जथेदार जगदेव सिंह तलवंडी ने भी अपने अलग अकाली दल का गठन किया था। ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद 1985 में सभी अकाली नेताओं ने संत जरनैल सिंह भिंडरावाले के पिता बाबा जोगिंदर सिंह को अपनी सेवाएं सौंप दी।
बाबा जोगिंदर सिंह ने तलवंडी और लौंगोवाल अकाली दल को भंग कर दिया था। इसी साल संत लौंगोवाल ने बाबा जोगिंदर सिंह की अध्यक्षता में बने अकाली दल से नाता तोड़ लिया था। 1985 में मुख्यमंत्री बने सुरजीत बरनाला ने भी अपना अलग अकाली दल बनाया। इस अकाली दल के भी दो टुकड़े हो गए थे। जिसमें से विधानसभा के पूर्व स्पीकर रवि इंदर सिंह की अगुवाई में नया अकाली दल बना था।
श्री अकाल तख्त साहिब के तत्कालीन जत्थेदार रागी दर्शन सिंह ने अकाली दल के अलग-अलग धड़ों को एकजुट करने का प्रयास किया था। रागी दर्शन सिंह ने तीन फरवरी 1987 को सभी अकाली दल के प्रधान का इस्तीफा मांगा, लेकिन सुरजीत सिंह बरनाला ने इस आदेश को मानने से इंकार कर दिया था।
प्रो. मंजीत सिंह ने नए अकाली दल के गठन की घोषणा की
मई 1994 में अकाल तख्त के तत्कालीन जत्थेदार प्रो. मंजीत सिंह ने नए अकाली दल के गठन की घोषणा की। इस अकाली दल का नाम शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) रखा गया। प्रकाश सिंह बादल ने इस अकाली दल को मानने से इंकार कर नए अकाली दल की घोषणा कर दी। जिसका नाम शिरोमणि अकाली दल (बादल) रखा गया।
बादल ने अपने दल के नाम पर पहला उपचुनाव गिद्दड़बाहा से लड़ा और जीता था। 1999 के अंतिम दिनों में बादल-टोहड़ा के बीच हुए विवाद के बाद टोहड़ा ने सर्व हिंद अकाली दल की स्थापना की थी। दल ने 2002 का चुनाव लड़ा लेकिन हार गई। हालांकि बादल अकाली दल के उम्मीदवारों को भी हार मिली। 2003 में टोहड़ा का अकाली दल बादल अकाली दल में शामिल हो गया।
ब्रह्मपुरा का अकाली दल पंथ को कितना मान्य होगा, यह तो समय तय करेगा, लेकिन यह सच है कि ब्रह्मपुरा की पार्टी अकाली दल की उस परंपरा और इतिहास में एक और पन्ना जोड़ देगी जो विभाजन का गवाह रहा है।