चंडीगढ़। तीन साल बाद शहर के पार्कों को रोशन करने की तैयारी है। शहर के पार्कों में छह हजार लाइटें लगाने के लिए लीगेरो लाइटिंग इंडिया प्राइवेट लिमिटेड कंपनी को टेंडर दिया जाएगा। इस माह के अंत तक सभी दस्तावेज पूरे कर कंपनी को काम सौंप दिया जाएगा। इसके बाद दो माह में कंपनी काम पूरा करके देगी। इस काम के लिए दो करोड़ रुपये में टेंडर हुआ हुआ है।
पार्कों में लाइट लगाने के लिए 8 कंपनियों ने आवेदन किया था। इनमें एमएस एचक्यू लैम्प्स मैन्युफैक्चरिंग को. प्राइवेट लिमिटेड, एमएस एस्केनटेक लाइटनिंग सोल्यूशन, एमएस ट्विंकल ल्यूमिनायर्स प्राइवेट लिमिटेड, एमएस पंजाब इंडस्ट्रियल वर्क प्राइवेट लिमिटेड, एमएस करनस मार्केटिंग, एमएस त्रिदंत सेल्स, एमएस पीसीपी इंटरनेशनल लिमिटेड, लीगेरो लाइटिंग इंडिया प्राइवेट लिमिटेड शामिल थीं। साढ़े चार करोड़ के प्रोजेक्ट के तहत कंपनियों को 2 माह में 6 हजार लाइटें पार्कों में लगानी थीं। इसके लिए फाइनेंशियल बिड में सबसे कम बोली दो करोड़ रुपये लीगेरो लाइटिंग इंडिया प्राइवेट लिमिटेड कंपनी ने लगाई। निगम के बिजली विभाग का कहना है कि मानना है कि इस माह के अंत तक जरूरी दस्तावेज पूरे कर काम शुरू करा दिया जाएगा जो जनवरी तक खत्म हो जाएगा।
2017 में शुरू हुआ था काम
निगम आयुक्त केके यादव ने बताया कि 2017 में पार्कों में लाइट लगाने के लिए ईएसएल कंपनी के साथ अनुबंध हुआ था। कंपनी ने पार्कों में पोल तो लगा दिए लेकिन लाइट नहीं लगा सकी। कंपनी के अधिकारियों का कहना था कि उनके पास एलईडी लाइटें नहीं हैं। इस काम के लिए ईएसएल ने कई बार टेंडर किया, लेकिन किसी कंपनी ने रुचि नहीं दिखाई। इस कारण प्रोजेक्ट में लगातार देरी होती गई। आखिरकार कंपनी ने कहा कि निगम इसके लिए खुद टेंडर लगा सकता है। उसके बाद निगम ने पिछले माह लाइटों के लिए टेंडर लगाया था।
आरडब्ल्यूए व पार्षदों ने भी जताई थी नाराजगी
पार्कों में पोल लगाने के बाद जब लाइटें नहीं लगीं तो निगम आरडब्ल्यूए के सदस्यों के निशाने पर आ गया। सदस्यों ने कई बार पत्र लिखे। यहां तक कि प्रशासन में भी गए, लेकिन उनका कहना था कि ठेकेदार पैसे लेकर भाग गया। हालांकि निगम के अधिकारियों ने उन्हें वास्तविकता बताई। तब जाकर वे शांत हुए। इधर, इस मामले में जब क्षेत्रीय पार्षदों पर दबाव बढ़ा तो उन्होंने सदन की बैठक में हंगामा किया। पार्षदों ने कहा कि ईएसएल से यह टेंडर क्यों नहीं छीना जा रहा है। हर साल दीपावली तक लाइटें लगाने का वादा होता है, फिर कोई हल नहीं निकलता। निगम ने दिल्ली पत्र भेजकर इस संबंध में कंपनी के अधिकारियों को बताया, तब जाकर मामला हल हो सका।