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'5 लाख देती हूं, मेरे सामने सज्जन कुमार के बच्चों को जलाओ' 84 का इंसाफ मिला, तो जुबां पर आया दर्द

Tue, 18 Dec 2018 01:01 PM IST
Priyesh Mishra न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
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1984 के सिख दंगा पीड़ित
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मेरे बेटों को गले में टायर डालकर जिंदा जला दिया था, 5 लाख रुपये देती हूं मेरे सामने सज्जन कुमार के बच्चों को जलाओ। 1984 के सिख दंगा पीड़ितों को इंसाफ मिला तो दर्द भी जुबां पर आ गया।
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‘सज्जन को फांसी पर लटकाओ तभी होगा न्याय’
दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को उम्रकैद की सजा की खबर के बाद लुधियाना की सीआरपी कॉलोनी में हलचल दिखी। 1984 दंगों के कई पीड़ित परिवार यहां रहते हैं। 34 साल बाद आए फैसले से दंगा पीड़ित परिवारों के जख्मों पर कुछ मरहम लगा लेकिन दंगा पीड़ित इस फैसले से पूरी तरह खुश नहीं हैं। उनका मानना है कि सज्जन कुमार को फांसी होनी चाहिए। दंगों में शामिल रहे अन्य लोगों को भी सजा मिलनी चाहिए। मध्य प्रदेश के नवनियुक्त सीएम कमलनाथ को सजा भी होनी चाहिए। तब उन्हें कुछ राहत मिलेगी। दिल्ली दंगों के बाद से लुधियाना में लगभग पांच हजार दंगा पीड़ित परिवार रहते हैं।  

पांच लाख देती हूं, मेरे सामने सज्जन के बच्चों को जलाओ
गुरदयाल कौर (70) बताती हैं कि दिल्ली की रानी सब्जी मंडी में वह अपने दो बेटों और पति के साथ रहती थी। जब दंगों की खबर फैली तो शाम को पूरा परिवार घर पर था। अचानक शाम पांच बजे कुछ दंगाई घर में घुस आए। उनके बेटे हाकम सिंह (20) और अमरजीत सिंह (30) को घर से निकाल लिया। उनकी आंखों के सामने गले में टायर डालकर आग लगा दी। इसी गम में कुछ समय बाद उसके पति की मौत हो गई। आज यह नेता बोल रहे हैं कि दंगा पीड़ितों को दो लाख रुपये दे दिए गए हैं, मैं 5 लाख रुपये देने को तैयार हूं। क्या सज्जन कुमार मेरी आंखों के सामने अपने बच्चों को आग के हवाले करवाएंगे।
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जब दंगाइयों ने घेर ली थी ज्ञानी जैल सिंह की कार

1984 दंगे का फैसला
सबसे पहले हमला तो राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह की कार पर हुआ था, जिसके चश्मदीद गवाह बने त्रिलोचन सिंह। इंदिरा गांधी की हत्या का समाचार सुन तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह उत्तरी यमन की अपनी यात्रा समय से पहले खत्म कर दिल्ली लौटे थे। ज्ञानी जैल सिंह हवाई अड्डे से इंदिरा गांधी के अंतिम दर्शन करने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) जा रहे थे। आरके पुरम के पास उनकी मोटर के काफिले पर हमला हो गया था।

उनके साथ अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व चेयरमैन त्रिलोचन सिंह भी थे, जो राष्ट्रपति के प्रेस अधिकारी भी थे। ज्ञानी जी की कार सबसे आगे थी, जबकि उनके पीछे सचिव और त्रिलोचन सिंह की कार थी। त्रिलोचन ने दंगों पर लिखी गई पुस्तक में जिक्र किया है कि मेरी कार के सामने जलती मशालें लेकर कुछ लोग आ गए और हमारे ऊपर मशालें फेंकी गईं, लेकिन ड्राइवर ने किसी तरह से बचाकर मुझे घर तक पहुंचाया।

34 साल बीते, आंसू सूखते नहीं  
72 साल की गुरदेव कौर की आंखों से सोमवार को आंसू बार बार छलक रहे थे। 1984 दंगों के समय वह अपने पति बंत सिंह के साथ कोलकाता में थी। वहां पर दंगाई ने उसके पति को मौत के घाट उतार दिया। आज तक वह मंजर नहीं भूल सकी है।

सरेबाजार फांसी पर लटकाओ
82 साल की बीबी हरबंस कौर के अनुसार वह अपने परिवार के साथ शारदा (दिल्ली) में रहती थी। दंगाइयों ने पूरे परिवार को तो खत्म किया ही, बहू बेटियों की इज्जत को भी तार-तार किया। सज्जन कुमार जैसे दोषियों के लिए उम्रकैद की सजा बहुत कम है। ऐसे लोगों को सरेबाजार फांसी पर लटकाना चाहिए। तभी उनको कुछ शांति मिलेगी।

हरियाणा के भाग सिंह को दिल्ली में ट्रक समेत दिया था फूंक

1984 sikh riots
1984 के दंगों में हरियाणा और पंजाब ने बड़े जख्म झेले थे। इन दोनों सूबों ने सन 1947 में बंटवारे के दौरान हुए पलायन जैसा दंश सन 1984 के दंगों के दौरान भी झेला। दंगे के बाद हिंदू पीड़ितों ने पंजाब छोड़ा, तो कई सिख पीड़ितों को हरियाणा भी छोड़ना पड़ा। लूटपाट और हिंसा की घटनाओं ने दोनों सूबों को ऐसी आग में झुलसा दिया था कि ये जख्म आज भी हरे दिखते हैं। हरियाणा के कई जिलों में सिख परिवारों को निशाना बनाया गया था। लेकिन एक घटना ऐसी थी, जिसे याद कर आज भी सिहरन पैदा हो जाती थी।

मामले के जानकार हरबंस सिंह ने बताया कि अंबाला के गांव बलाना में भाग सिंह का परिवार आज भी उस घटना के जख्म से उबरा नहीं है। उन्होंने बताया कि भाग सिंह एक ट्रक ड्राइवर थे और दिल्ली में एक कंसाइनमेंट छोड़ने गए थे। दिल्ली पहुंचे तो मालूम हुआ कि सिख-हिंदू दंगे भड़क चुके हैं। जब तक संभलते तो दंगाइयों ने उनके ट्रक को ही घेर लिया था। उन्हें ट्रक से बाहर आने का मौका ही नहीं मिला और दंगाइयों ने उनके ट्रक में आग लगा दी। पूरा ट्रक और भाग सिंह आग में झुलस गए। उनका कंकाल ट्रक में ही बरामद हुआ था। उनका एक बेटा चतन सिंह और तीन बेटियां बहुत छोटी थी और उनकी पत्नी ने बहुत ही विषम परिस्थितियों ने अपने बच्चों को पाला।

इसी तरह अंबाला सिटी में दुप्पटों का कारोबार करने वाले एक सिख का कत्ल इन्हीं दंगों के दौरान ट्रेन में कर दिया गया था। शहीद बाबा दीप सिंह सेवा सोसायटी हरियाणा के अध्यक्ष हरविंद्र सिंह नीटू ने बताया कि करनाल, पानीपत, अंबाला, एनसीआर क्षेत्र, रेवाड़ी, सोनीपत, यमुनानगर, रोहतक समेत कई जिलों में सन 1984 के दंगों में बहुत ज्यादा लूटपाट और हिंसक घटनाएं हुई थी, इसलिए उस वक्त पलायन ही एक मात्र बचाव का रास्ता दिख रहा था। उनके अनुसार उस दंगाइयों ने तविंद्रजीत सिंह की मिठाइयों की दुकान, कुलवंत सिंह की दुकान, अवतार सिंह थोक चीनी की दुकान, खालसा बेकरी समेत कई दुकानों में मारपीट और लूटपाट कर दुकानों में आग लगा दी गई है।

 

महावीर चक्र विजेता मनमोहन बीर के घर को भी फूंक दिया था दंगाइयों ने

Sikh riots 1984
एक नवंबर 1984 को जब दिल्ली जल रही थी तो भारतीय सेना में काम कर महावीर चक्र पाने वाले कैप्टन मनमोहन बीर सिंह अपनी जान बचाने के लिए हाथ जोड़कर गुहार लगा रहे थे। वे भीड़ को कह रहे थे कि मैंने देश की रक्षा की है, मेरी जान बख्श दो, मेरे बच्चों पर रहम करो। पर हमला करने वाली भीड़ कहां मानने वाली थी, चार बार रुक रुककर बंगले पर अटैक किया गया, बंगले के अंदर आग के गोले फेंके गए। एक बार तो उन्होंने इंदिरा गांधी अमर रहे, इंदिरा गांधी जिंदाबाद के नारे भी लगाए लेकिन हमलावरों का दिल नहीं पसीजा। उनका गारमेंट का शोरूम लूट लिया, बंगले में आग लगा दी।

आखिरकार उन्होंने अपनी दोनाली से हवाई फायर किया, जिसके बाद भीड़ तितर बितर हो गई लेकिन तब तक उनका सब कुछ स्वाह कर दिया गया था। जांच एजेंसी को दिए गए शपथ पत्र में कैप्टन मनमोहन बीर सिंह तलवार ने कहा था कि वह दिल्ली पटेल नगर में बंगला नंबर 9 में रहते थे। 1971 की जंग में सरकार ने उन्हें महावीर चक्र से नवाजा था। पहली बार भीड़ 9.30 बजे आई और खिड़की पर पथराव किया। बंगले के बाहर बने शटर के ताले तोड़ डाले और बेडरूम में आग के गोले फेंकने शुरू कर दिए। मेरे पड़ोस में रहने वाले संजय सिंह, दुग्गल ने मिन्नत कर भीड़ को वापस भेजा। 10 बजे फिर भीड़ डीटीसी की बसों में सवार होकर आई और आते ही बंगले के अंदर आग के गोले फेंकने शुरू कर दिए।

पड़ोस में रहने वाले प्रवीण चड्डा, संजय और दुग्गल दोबारा आए लेकिन भीड़ नहीं मानी। उन्होंने बंगले को लूटना शुरू कर दिया। मैंने उनको मनाने के लिए इंदिरा जिंदाबाद के नारे भी लगाए। यह सिलसिला रात साढ़े आठ बजे तक चलता रहा। जब लगा कि अब मैं और मेरा परिवार जिंदा नहीं बचेगा तो अपनी दोनाली से हवाई फायर कर दिया। इसके बाद भीड़ तितर बितर हो गई। बाद में पुलिस आई और मुझे हथियारों सहित सरेंडर करने के लिए कहा। मैंने पुलिस के सामने हथियार जमा करवाकर अपनी जान बचा ली लेकिन बाद में पुलिस ने उल्टा मुझ पर ही केस दर्ज कर लिया।

दिल्ली ने दिए जख्म बड़े गहरे

सिख विरोधी दंगों की त्रासदी
जब मैं करीब 9-10 साल की थी, तब देश का बंटवारा हुआ था। हमारा परिवार पाकिस्तान में झेलम जिले में रहता था। वहां अपना सब कुछ छोड़कर हिंदुस्तान आ गए थे। कई दिन कुरुक्षेत्र में लगे शिविर में रहे। इसके बाद परिवार दिल्ली में सैटल हो गया था। अभी जिंदगी ट्रैक पर आने ही लगी थी कि 1984 सिख दंगों ने गहरे जख्म दे दिए। तब से लेकर अब तक रोटी और मकान का संघर्ष चल रहा है। यह कहते ही 87 वर्षीय संतोष कौर की आंखें भर आईं। उन्होंने कहा कि सज्जन कुमार को सजा मिलने से उनके जख्मों पर थोड़ा मरहम लगा है। हालांकि फैसला देरी से आया है।

दामाद ने दो रातें पेड़ पर गुजारी थीं
संतोष कौर ने बताया कि जब सिख दंगे भड़के थे तब उनके दामाद ने बड़ी मुश्किल से अपनी जान बचाई थी। वह एक घने पेड़ पर चढ़ गया था। साथ ही दो दिन तक पेड़ पर ही बैठा रहा था। माहौल थोड़ा शांत हुआ तो साथ लगते गांव में अपने दोस्त के घर चला गया था।

दंगा पीड़ितों ने जो झेला बयां करना मुश्किल है
कश्मीर कौर ने बताया कि दिल्ली में हुए दंगों में सिखों ने जो झेला है उसे शब्दों में बयान करना नामुमकिन है। कितने ही परिवारों को तबाही के बाद दिल्ली से भागना पड़ा। पंजाब में पहुंचकर नए सिरे से जिंदगी शुरू करनी पड़ी। यह खुशी की बात है इंसाफ मिला। सज्जन कुमार दोषी निकला। इसी तरह उम्मीद है कि कोर्ट में चल रहे अन्य मामलों में भी पीड़ितों को इंसाफ मिलेगा।

परिवार के सात लोगों को जिंदा जलाया था

sikh riots
लुधियाना निवासी भूपिंदर कौर (70) कहती है कि वह उस दिन को कभी भूल नहीं सकती है। दोपहर लगभग 12.30 बजे का समय था। जब दंगाई दिल्ली में सुल्तानपुरी स्थित उनके घर में घुस आए और उसके पति बंत सिंह, देवर कुलवंत सिंह, चाचा मघर सिंह और 21 साल के भांजे स्वर्ण सिंह को बाहर निकालकर ले गए। मेरी आंखों के सामने सभी को जिंदा जला दिया गया था। मौत भी ऐसी दी जिस बारे में सोचकर आज भी रात को नींद नहीं आती।

जिस दिन इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी, उसी दिन उनकी देवरानी चरणजीत कौर के जुड़वां बच्चे पैदा हुए थे। दंगाइओं ने उन्हें भी नहीं छोड़ा। चंद दिनों के बच्चों को आग के हवाले कर दिया। वह जब भी परिजनों को बचाने के लिए आगे जाती, उन्हें पीछे फेंक दिया जाता है। उस समय उनके कूल्हे में चोट लगी, आज तक दर्द बर्दाश्त कर रही है। यह सजा बहुत कम है, फांसी हो तभी सज्जन कुमार के परिवार को पता चले कि किसी के परिवार को खत्म करने से क्या दर्द होता है।

आंखों के सामने जला था घर, मुस्लिम परिवार बना था मददगार
गुरमीत सिंह बताते हैं कि 1984 में जिस समय दिल्ली में माहौल खराब हुआ था, उस समय मेरी उम्र करीब छह सात-साल की थी। हम त्रिलोकपुरी में रहते थे। रविवार का दिन था। मेरे पिता, मौसा और मामा सब घर पर थे। इसी बीच उन्हें किसी ने बता दिया था कि उनके घर पर हमला हो सकता है, क्योंकि हमारे मोहल्ले में दो-तीन ही सिख परिवार रहते थे।

छोड़ी देर बाद ही हमारे घर पर हमलावर आ गए। बड़ी मुश्किल से जान बचाकर निकले। उस मुश्किल के समय में एक मुस्लिम परिवार ने मदद की थी। एक मुस्लिम परिवार ने उन्हें रात अपने घर पर रखा था, जबकि दंगे में शामिल लोगों ने उनके घर में पहले तोड़फोड़ की। फिर आग लगा दी।
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दंगों में गायब हुए भाई व उसके परिवार का आज तक सुराग नहीं

sikh riots
1984 सिख दंगों वाले दिन आज भी मेरी आंखों के सामने आ जाते हैं, तो दिल डर जाता है। मेरा भाई प्रद्युम्न सिंह व उसके परिवार के चार अन्य सदस्य दंगों के दौरान गायब हो गए थे। उनका आज तक कोई सुराग नहीं लग पाया है। वहीं, हम अपनी जान बचाने के लिए अपने बाल कटवाकर बड़ी मुश्किल से दिल्ली से निकले थे। यह कहना है 1984 दंगों का शिकार हुए गुरदीप सिंह (69) का। उन्होंने बताया कि सिख दंगों में सज्जन कुमार को उम्रकैद की जगह फांसी होनी चाहिए थी। जो काम इन्होंने किया है, वह काफी घिनौना था।

गुरदीप सिंह का कहना था कि 1984 से पहले दिल्ली में माहौल काफी अच्छा था। उनकी एक छोटी सी वर्कशॉप थी। जहां वह गाड़ियां रिपेयर करते थे और जहांगीर पुरी में रहते थे। दंगे शुरू होते ही दिल्ली का माहौल खराब हो गया। हर तरफ खून खराबा था। इसी दौरान उसका भाई व उसके परिवार के पांच मेंबर अचानक गायब हो गए थे। उनका उस समय कोई सुराग नहीं लगा। इसके बाद हालात काफी खराब हो गए। उस समय वे बाल कटवाकर रात को वहां से भागे थे।

मुझे फ्राक पहनाई, पिता और मौसा ने कटवाए बाल
गुरमीत सिंह ने कहा कि उस समय माहौल खराब था। सिखों पर एकदम हमले हो रहे थे। उस समय उनके पिता और मौसा ने अपने बाल कटवा लिए थे। उसे लड़की बनाकर फ्राक पहनाकर घर से निकले थे, जबकि मामा ने बाल कटवाने से मना कर दिया था।
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