निर्भया कांड के बाद हुआ था कानून में संशोधन
जिला अदालत के वरिष्ठ वकील एडवोकेट दीपक भारद्वाज ने बताया कि दिल्ली में हुए निर्भया हत्याकांड के बाद कानून में संशोधन हुआ था। तय हुआ था कि अगर वारदात के समय नाबालिग की उम्र 16 साल से ऊपर है तो वह अच्छा व बुरा समझने की समझ रखता है। उसे बालिग मानकर केस चलाया जा सकता है।
किसी ने पुलिस को सूचना दी थी कि गांव में युवती की मौत हो गई है, उसका जल्दबाजी में परिजनों ने अंतिम संस्कार किया गया है। चिता श्मशान में जल रही है। पुलिस तत्काल गांव में पहुंची, जहां श्मशान में जल रही चिता को फायर ब्रिगेड को बुलाकर बुझवाया। युवती के शव को बाहर निकाला गया। पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी भी करवाई गई। एफएसएल की टीम ने मौके पर पहुंचकर जांच पड़ताल की।
तीनों को उम्रकैद की सजा, 47-47 हजार रुपये जुर्माना भी भरना होगा
अदालत ने तीनों दोषियों को आईपीसी की धारा 302 के तहत उम्रकैद व 20-20 हजार रुपये जुर्माना, जुर्माना न देने पर एक-एक साल की अतिरिक्त सजा, जबकि सबूत मिटाने की धारा 201 के तहत सात-सात साल की कैद व 5-5 हजार रुपये जुर्माना, जुर्माना न देने पर छह-छह माह की अतिरिक्त सजा सुनाई गई है। इसके अलावा धारा 203 के तहत 2-2 साल कैद व दो-दो हजार रुपये जुर्माना, जुर्माना न भरने पर एक-एक माह की अतिरिक्त सजा और साजिश में शामिल होने की धारा 120बी, 34 के तहत उम्रकैद व 20-20 हजार रुपये जुर्माने की सजा दी है।
हत्या के समय नाबालिग था भाई, बालिग मानकर सुनाई गई सजा
मामले में युवती के माता-पिता के अलावा उसके भाई को भी उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। वारदात सितंबर 2018 में हुई थी, उस समय मृतका के भाई की उम्र 17 साल के करीब थी। उसे बाल सुधार गृह भेजा गया था। उसके खिलाफ प्रिंसिपल कोर्ट में केस चला। फैसले के समय अब वह बालिग हो चुका है। अदालत ने माता-पिता के साथ उसे भी उम्रकैद की सजा दी है।