चंडीगढ़ के सरकारी अस्पतालों में सफाई की व्यवस्था तो बेहतर है लेकिन मरीजों को दी जा रही सुविधाओं की स्थिति बदतर है। आलम यह है कि पीजीआई और जीएमसीएच-32 जैसे रेफरल सेंटर में सैकड़ों मरीज स्ट्रेचर पर भर्ती किए गए हैं। इन मरीजों और उनके परिजनों को गंदे चादर व गंदे बेड की शिकायत करने की नौबत ही नहीं आ रही है क्योंकि उन्हें तो एक बेड भी मयस्सर नहीं हो पा रहा है। दोनों ही अस्पतालों की इमरजेंसी में भर्ती का कार्ड बनवाने के बाद परिजन किसी तरह एक स्ट्रेचर का जुगाड़ कर मरीज का इलाज शुरू करा रहे हैं।
सीन 1
पीजीआई इमरजेंसी में गैलरी से लेकर वार्ड तक भर्ती मरीजों का तांता लगा हुआ है। वार्ड में लगाए गए चंद बेड पर साफ चादर बिछी हुई है लेकिन उनके अलावा वहां भर्ती सैकड़ों मरीज स्ट्रेचर पर लेटे हुए हैं। कुछ मरीजों के परिजनों ने घर से लाई हुए चादर स्ट्रेचर पर बिछा कर उन्हें लेटाया है तो कुछ बिना चादर के ही दर्द से तड़प रहे हैं। 8 से 10 बेड वाले एक एक वार्ड में 70 से 80 मरीजों को भर्ती किया गया है। नतीजन एक तिहाई से ज्यादा मरीज गैलरी से लेकर प्रवेश द्वार तक स्ट्रेचर पर पड़े हुए हैं। वहीं संस्थान के प्रत्येक बिल्डिंग और वार्ड एयर कंडीशन है। शौचालय भी हर चार घंटे पर साफ किए जा रहे हैं। गंदगी का कहीं नामोनिशान नहीं है।
सीन 2
जीएमसीएच-32 की इमरजेंसी में स्थिति और दयनीय है। लिफ्ट से लेकर गलियारे तक मरीजों की भीड़ है। वह सभी मरीज स्ट्रेचर पर भर्ती किए गए हैं। वहां एक मरीज से दूसरे मरीज के बीच की दूरी भी स्ट्रेचर के कारण समाप्त हो गई है। इतना ही नहीं मरीजों की संख्या इतनी ज्यादा है कि एनएस की बोतल लगाने के लिए स्टैंड तक उपलब्ध नहीं हैं। बोतल लटकाने के लिए दीवारों पर कील ठोक कर व्यवस्था बनाई गई है। वार्ड में भी मरीजों का दबाव साफ नजर आ रहा है। वार्ड में लगाए गए बेड के बीच में भी स्ट्रेचर लगाकर मरीजों को भर्ती किया गया है।
लाखों मरीजों का दबाव
चंडीगढ़ में शहर की जनता के साथ ही एक साल में देशभर के लगभग 35 लाख मरीजों को इलाज मिल रहा है। इसमें पीजीआई में लगभग 27 से 28 लाख व जीएमसीएच-32 व जीएमएसएच-16 में छह से सात लाख मरीज इलाज कराने आ रहे हैं। इन मरीजों को बेहतर चिकित्सा उपलब्ध कराने के लिए 3720 बेड का संचालन किया जा रहा है। नतीजतन सैकड़ों मरीजों की जान बचाने के लिए उन्हें मजबूरी में स्ट्रेचर पर भर्ती कर इलाज करना पड़ रहा है।
रेफर का नहीं कोई मानक
पीजीआई और जीएमसीएच-32 पर रेफर मरीजों का दबाव दिनोंदिन तेजी से बढ़ता जा रहा है। दोनों ही अस्पतालों के प्रबंधक इससे खासा परेशान है। चाहे पीजीआई के निदेशक हो या जीएमसीएच 32 की डायरेक्टर प्रिंसिपल दोनों का यही मानना है कि जब तक आसपास के प्रदेश रेफर मरीजों को लेकर मानक नहीं तय करते तब तक संस्थानों में भर्ती मरीजों को बेहतर चिकित्सा मुहैया कराना संभव नहीं हो पाएगा। इनके अनुसार मरीजों को रेफर करने के लिए मानक तय किए जाने बेहद जरूरी हैं, क्योंकि जीएमसीएच-32 और पीजीआई की ओपीडी और इमरजेंसी में ऐसे मरीज इलाज कराने आ रहे हैं जिनका प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों व सिविल अस्पतालों में इलाज संभव है।
इन योजनाओं से बंधी आस
जीएमसीएच-32
300 बेड का ट्रामा सेंटर और 300 बेड का मदर चाइल्ड केयर सेंटर का दो से तीन साल में हो जाएगा निर्माण
जीएमएसएच-16
300 बेड के मदर चाइल्ड केयर सेंटर का निर्माण शीघ्र होगा
मरीजों की बढ़ती संख्या से योजनाएं चिकित्सा संस्थानों को निर्माणाधीन योजनाओं से कुछ उम्मीद है। गौरतलब है कि इन योजनाओं में पीजीआई में 300 बेड का मदद एंड चाइल्ड केयर सेंटर, फिरोजपुर सैटेलाइट सेंटर, संगरूर सैटेलाइट सेंटर, ऊना सैटेलाइट सेंटर व हिमाचल और पंजाब में स्वीकृत तीन सैटेलाइट सेंटर शामिल हैं। पीजीआई में निर्माणाधीन 300 बेड के एडवांस न्यूरो साइंस सेंटर की सुविधा 2022 के अंत तक में मिलने लगेगी। वहीं दूसरी तरफ जीएमसीएच-32 में 300 बेड के ट्रामा सेंटर और 300 बेड के मदर चाइल्ड केयर सेंटर का भी निर्माण दो से तीन साल के बीच पूरा कर लिया जाएगा। स्वास्थ्य विभाग के तहत जीएमएसएच-16 में 300 बेड के मदर चाइल्ड केयर सेंटर का निर्माण भी शीघ्र शुरू होने वाला है। जिस रफ्तार से मरीजों की संख्या बढ़ रही है उसके अनुसार आने वाले समय में इन योजनाओं से भी कुछ खास लाभ नहीं मिल पाएगा।
पीजीआई के नेहरू एक्स्टेंशन और सेक्टर-48 में स्टाफ नहीं किया तैनात
400 बेड वाले पीजीआई के नेहरू एक्स्टेंशन, 100 बेड के सेक्टर-48 के अस्पताल का भी लाभ मरीजों को नहीं मिल पा रहा है। वजह इन दोनों अस्पतालों में मानव संसाधन की व्यवस्था न होना है। मरीजों के बढ़ते दबाव को कम करने के लिए पीजीआई और सेक्टर-48 में नई बिल्डिंग तो बना दी गई लेकिन उसे चलाने के लिए डॉक्टर और अन्य स्टाफ की तैनाती नहीं की। अकेले सेक्टर- 48 के अस्पताल को संचालित करने के लिए 74 डॉक्टर, 161 पैरामेडिकल स्टाफ, 10 प्रशासनिक अधिकारी, एक ज्वाइंट कंट्रोलर, एक डिप्टी कंट्रोलर और एक सेक्शन अफसर की जरूरत है।