लोकसभा चुनाव की घोषणा के साथ ही पंजाब में सियासी अटकलें और राजनीतिक वफादारी दरकने का सिलसिला शुरू हो गया है।
चुनाव से पहले नेताओं के अपनी पार्टियां छोड़ दूसरी पार्टियों में जाने के सिलसिले से लग रहा है कि राज्य में इस बार चुनावी परिदृश्य कुछ अलग रहेगा।
हाल में कांग्रेस के विधायक जीत मोहिंदर सिद्धू और पूर्व विधायक मलकीयत सिंह बिरमी कांग्रेस का साथ छोड़कर सत्तारूढ़ अकाली दल में शामिल हो गए और पंजाब पीपुल्स पार्टी के अध्यक्ष व पूर्व वित्त मंत्री मनप्रीत बादल को बठिंडा लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस का टिकट मिलने की संभावना प्रबल हो गई।
हालांकि प्रदेश में मुख्य मुकाबला तो परंपरागत दोनों प्रमुख पार्टियों कांग्रेस और अकाली-भाजपा गठबंधन के बीच ही होगा। फिर भी पार्टी छोड़ने और दूसरी पार्टियों से जुड़ने का सिलसिला जारी है।
अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर बादल की बातों पर गौर किया जाए तो कांग्रेस के कुछ और चेहरे हवा का रुख भांपकर अकाली दल की ओर आ सकते हैं।
पंजाब में अकाली दल ने दस सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा सबसे पहले कर दी थी जबकि कांग्रेस ने अपने मौजूदा सांसदों- पटियाला से विदेश राज्य मंत्री परनीत कौर, संगरूर से विजय इंदर सिंगला, श्री आनंदपुर साहिब से रवनीत सिंह बिट्टा पर ही दांव खेला है।
श्री खडूर साहिब सीट से नये चेहरे हरमिंदर सिंह गिल को टिकट दिया गया है। कांग्रेस में नौ टिकटों का वितरण अभी नहीं किया है और उम्मीदवारों के नामों की घोषणा में देरी आलाकमान को भी नुकसानदायक दिखाई दे रही है।
पिछली बार भी टिकटों के वितरण में देरी से कांग्रेस को नुकसान हुआ था। टिकटों का बंटवारा नहीं होने के कारण इस बार भी कांग्रेस अभी तक गुटबाजी से उबर नहीं पाई है और तीन प्रमुख धड़ों के कारण पार्टी में टांग खिंचाई जारी है।
नामों की घोषणा के बाद नेता अपने उम्मीदवारों के प्रचार पर केन्द्रित हो जाएंगे। वैसे कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष प्रताप सिंह बाजवा के बीच जारी वर्चस्व की लड़ाई कांग्रेस को नुकसान पहुंचा सकती है।
आलाकमान के दबाव में हालांकि दोनों ने पिछले माह चुनाव तक एक दूसरे का साथ देने का बयान दिया था। भाजपा भी अपने हिस्से की तीन सीटों में से एक पर भी अपने उम्मीदवारों की घोषणा नहीं कर सकी है।
अकाली दल का चुनाव प्रचार काफी पहले शुरू हो गया था। राज्य में सभी तेरह सीटों पर चुनाव तीस अप्रैल को होगा। हालांकि भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी जगरांव में रैली करके पार्टी के चुनाव प्रचार शुरू कर चुके हैं लेकिन पार्टी उम्मीदवारों की घोषणा में देरी इसे नुकसान पहुंचा सकती है।
राज्य में अनुसूचित जाति तथा पिछड़ वर्ग का वोट 32 प्रतिशत है जो देश का सबसे अधिक है। यहां मुस्लिम व अल्पसंख्यकों का वोट लंबे समय तक कांग्रेस के पास था, जो पिछले कुछ चुनावों के बाद कांग्रेस से छिटककर अकाली दल सहित अन्य पार्टियों के साथ चला गया है। कांग्रेस के सामने अपने पुराने वोट बैंक को वापस लाना सबसे बड़ी चुनौती है।