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केयू की गोद में समा गया हरियाणा!

Wed, 29 Oct 2014 12:26 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/कुरुक्षेत्र।
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पिछले 29 बरस के दौरान गीत संगीत के माहौल में झूमते हुए बड़ी हुई रत्नावली की गोद अब हरियाणवी संस्कृति से भर चुकी है। लुप्त हो रही हरियाणावी संस्कृति को बचाने का यह प्रयास 1985 में शुरू हुआ था।
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करीब तीन दशकों में जहां रत्नावली सांस्कृतिक विधाओं के आभूषणों से लद चुकी है, वहीं इसके मुख में अब ठेठ हरियाणवी छप्पन भोग जैसा स्वाद भी घुल रहा है। एक मंच से शुरू हुए इस आयोजन की झंकार अब केयू के सात मंचों पर गूंज रही है।

इस महोत्सव के दूसरे दिन केयू की पार्किंग और सड़कें वाहनों से अटी दिखाई दी। बहरहाल ये सांस्कृतिक महोत्सव एक बेहतर मेले का रंग ले चुका है। इसमें उत्सव का माहौल है और लजीज व्यंजनों के साथ-साथ खरीदारी के लिए स्टाल सजे हैं। इन स्टालों पर बैठे डेलीगेट्स ‘पधारो म्हारे देस...’ भले न बोल रहे हों, लेकिन उत्सव की रंगत में रचे-बसे युवाओं में जो खुमारी यहां दिखती है, उसे देख कर ऐसा प्रतीत होता है कि लघु हरियाणा केयू की गोद में समा गया है।
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अगर आप रत्नावली महोत्सव में आएंगे तो आपको यहां हरियाणवी परिवेश पर तैयार हो रही चित्रकारी के दर्शन होंगे, हरियाणावी पगड़ी पहन कर आप भी कुछ देर के लिए पुराने ग्रामीण परिवेश को धारण कर घुल मिल सकते हैं।

थोड़ा आगे चलेंगे तो धमाल मंच के सामने और धरोहर के सामने प्रोफेशनल कलाकारों की टीमें झूमती मिलेगी। यदि मन करें तो आप भी इनके साथ झूम सकते हैं। थोड़ा थकावट हो तो हरियाणा की लस्सी की स्टाल पर जाइए और इसे पीकर फुल एनर्जी लीजिए, क्योंकि यहां आपकों एक या दो तरह की नहीं, बल्कि तीन तरह की लस्सी पीने को मिलेगी।

इसके निकट चटोरी गली की तर्ज पर कई स्टाल यहां लगे हैं, जिनमें गोहाना के प्रसिद्ध देसी घी के जलेब, नारियल मलाई लड्डू, कचौड़ी, तीन तरह के चूरमें, बाखली, गुड़ हलवा, कसार और अन्य कई व्यंजन चखने को मिल सकते हैं। अभी दो दिन बाकी है, क्योंकि 30 नवंबर तक पूरे जोशो-खरोश के साथ रत्नावली का धमाल यहां जारी रहेगा।  

रत्नावली की चटोरी गली में वाजिब दाम, बढ़िया स्वाद
रत्नावली उत्सव में केयू पर्यटन विभाग ने ठेठ हरियाणवी व्यंजनों के अलावा गुड़िया निर्माण कला, मिट्टी के बर्तन, कढ़ाई एवं बुनाई कला, हरियाणवी फुलझड़ी, धरोहर हरियाणा हांडी, लकड़ी क्राफ्ट, पीढ़ा भराई एवं बुनाई कला, मिट्टी टैराकोट के बर्तन, पुस्तक स्टाल ललित कला विभाग ने विशेष तौर पर कलाकारों और पर्यटकों के लिए लगाए गए हैं। पर्यटन विभाग के शिक्षक डॉ. सुरजीत कुमार, दिलबाग सिंह, सुमित, नवीन, संदीप रहेजा, संदीप धनखड़, आरती, राहुल गर्ग, मंजीत के साथ-साथ विभाग के विद्यार्थी कलाकारों को ठेठ हरियाणवी थाली व अन्य व्यंजनों की कीमत महज 10-20 और 50 रुपये ही तय की है।

आजा बहू आंगण मै...
प्रदेशभर से आए युवा कलाकारों ने लोकगीतों के माध्यम से आज रत्नावली में खूब रंग जमाया और दर्शकों ने भी ताल से ताल मिलाकर इसका खूब आनंद लिया। डीएवी गर्ल्स कॉलेज यमुनानगर की छात्राओं ने ‘दुल्हन ना चालो साथी, बण कै ना टोला...’, ‘यूटीडी के छात्रों ने जाणे वाली क्यों भटकै सै...’, आईजी कॉलेज कैथल की टीम ने आजा ‘बहू आंगण मै...’, आरकेएसडी कैथल की टीम ने ‘बहण तू अपणा परण निभाइये...’ लोकगीत से दर्शकों का खूब मनोरंजन किया। पंडित चिरंजीलाल गवर्नमेंट कॉलेज करनाल के छात्रों ने ‘ऐरे बीरा इक बै गेरियां मै जाइए...’ पर अपनी प्रस्तुति दी।

बुजुर्गों पर भी छाई रत्नावली की खुमारी
रत्नावली महोत्सव का जलवा नवयुवकों के साथ-साथ बुजुर्गों के भी सिर चढ़कर बोल रहा है। कुरुक्षेत्र से बुजुर्गों का एक जत्था सालों से यहां रत्नावली समारोह देखने आ रहा है। इस बार भी रत्नावली-2014 के  सभी सात मंचों पर युवा कलाकार एवं दर्शकों के साथ-साथ बड़ी संख्या में बुजुर्ग दर्शक रत्नावली का आनंद उठा रहे हैं। वे न केवल युवाओं की हौंसला-अफजाई कर रहे हैं, जहां पर कमियां हैं, वहां पर सुधारने के लिए भी युवाओं को प्रेरित कर रहे हैं। हरियाणवी पॉप सोंग, हरियाणवी नृत्य, सांग बुजुर्गों की पहली पसंद हैं
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