हरजिंदर कौर ने अपनी शुरुआती पढ़ाई चंडीगढ़ से ही की और इसके बाद सेक्टर-10 के होम साइंस कॉलेज से उच्च शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने बीएड, एमएड और एमफिल किया। वह चाहतीं तो कहीं और नौकरी कर सकती थीं, लेकिन उनकी मां का सपना था कि वह टीचर बनें।
जो भी करना है, डेडिकेशन के साथ करो। ये नहीं कि बस अपना पढ़ाकर चल दो। यह संदेश है 65 वर्षीय हरजिंदर कौर का, जिन्होंने अपना पूरा जीवन शिक्षा और बच्चों को समर्पित कर दिया। चंडीगढ़ के विभिन्न सरकारी स्कूलों में 32 साल तक बतौर अध्यापिका और बाद में हेडमास्टर सेवाएं देने वालीं हरजिंदर कौर का कहना है कि शिक्षक केवल किताबें पढ़ाने वाला नहीं, बल्कि बच्चों की जिम्मेदारी उठाने वाला मार्गदर्शक होता है।
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हरजिंदर कौर ने अपनी शुरुआती पढ़ाई चंडीगढ़ से ही की और इसके बाद सेक्टर-10 के होम साइंस कॉलेज से उच्च शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने बीएड, एमएड और एमफिल किया। वह चाहतीं तो कहीं और नौकरी कर सकती थीं, लेकिन उनकी मां का सपना था कि वह टीचर बनें। इसी वजह से साल 1983 में उन्होंने शिक्षा विभाग में बतौर होम साइंस अध्यापिका ज्वाइनिंग की। उनकी पहली पोस्टिंग सेक्टर-28सी के सरकारी स्कूल में हुई। इसके बाद उन्होंने सेक्टर-24, 20, 16 और 29 के स्कूलों में पढ़ाया और अंत में सेक्टर-30 के स्कूल में बतौर हेडमास्टर सेवानिवृत्त हुईं। इस लंबे सफर के दौरान उन्होंने हजारों बच्चों को पढ़ाया और शिक्षा विभाग को अपनी जिंदगी के 32 सुनहरे साल समर्पित किए।
बच्चों के बीच बनीं फेवरेट टीचर
अपने अनुभव साझा करते हुए हरजिंदर कौर ने कहा कि बच्चों के साथ समय का पता ही नहीं चलता था। हर दिन यह सोचकर स्कूल जाती थीं कि आज बच्चों को क्या नया सिखाना है। उनका मानना है कि होम साइंस आसान विषय नहीं है, इसलिए पहले खुद को सीखना पड़ता है और फिर बच्चों को। उन्होंने गर्व से बताया कि बच्चे उन्हें फेवरेट टीचर मानते थे, क्योंकि वह कभी डांटती या मारती नहीं थीं। यही वजह है कि आज भी जब उनके पुराने विद्यार्थी बाजार में मिल जाते हैं तो सबसे पहले उनके पैर छूते हैं। कई बच्चे तो आज भी उनके घर मिलने आते हैं।
नए शिक्षकों को संदेश
हरजिंदर कौर ने नए शिक्षकों को संदेश देते हुए कहा कि सिर्फ पीरियड पूरा कर देना ही काम नहीं है। शिक्षक की जिम्मेदारी बच्चे के भविष्य को गढ़ने की है। उन्होंने कहा कि बच्चे को देखो, उसकी जिम्मेदारी हमारी है। अपना पीरियड खत्म होने के बाद यह नहीं सोचना चाहिए कि काम खत्म हो गया। असली शिक्षक वही है, जो समर्पण और दिल से पढ़ाए।