उधर, ट्रांसपोर्टरों के लिए भी अपनी बसें अब 26.92 रुपये प्रति किलोमीटर रेट पर ही सरकार को देना एक तरह से उनकी मजबूरी भी बन चुका है। अधिकतर ट्रांसपोर्टरों ने इस योजना के अंतर्गत 510 में से 400 से अधिक बसें खरीद रखी हैं और उन्हें सरकारी प्रारूप के तहत तैयार भी करवा लिया है। अब यदि इन ट्रांसपोर्टरों ने जल्द से जल्द बसें सरकार के सुपुर्द नहीं की, तो ये बसें पर्यावरण मानक (बीएस-6 इंजन संबंधी नियम) में फंस जाएगी, क्योंकि ये बसें बीएस-4 इंजन नार्म्स के तहत तैयार की गई है।
अब पचड़ा यह है कि 31 मार्च के बाद देश में बीएस-4 इंजन व्हीकल का रजिस्ट्रेशन नहीं किया जाएगा। ऐसे में सरकार भी चाहती है कि जल्द से जल्द इन बसों का 31 मार्च से पहले रजिस्ट्रेशन करवाकर उन्हें सड़कों पर उतार दिया जाए।
केस और विजिलेंस कार्रवाई अपनी जगह, मगर योजना जनहित में
सीएम मनोहर लाल ने ये भी स्पष्ट कर दिया है कि 510 बसों को लेकर चल रहे विवाद के बाद विजिलेंस द्वारा दर्ज किया केस और विजिलेंस की कार्रवाई अपनी जगह है। इस योजना पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। सीएम ने कहा कि योजना जनहित में है और हाईकोर्ट के आदेशों पर ही हम 510 बसों के मालिकों से नेगोशिएट करके उन्हें 190 बसों वाले रेट पर ही लेने का प्रयास कर रहे हैं। योजना की अनियमितताओं पर जांच चलती रहेगी और जो दोषी होगा, उसके खिलाफ निश्चित ही कार्रवाई होगी। लेकिन 510 बसें जरूर सड़क पर जल्द उतरेगी।
ये थी योजना
अन्य राज्यों की तर्ज पर हरियाणा सरकार 700 बसों को किलोमीटर स्कीम के तहत निजी ट्रांसपोर्टरों से हायर करना चाहती थी। दो चरणों में टेंडर हुए। पहले चरण में 510 बसों का टेंडर प्राइवेट पोर्टल के माध्यम से हुआ। तो रेट 36 रुपये से लेकर 42 रुपये प्रति किलोमीटर तक तक आ गया। मगर शेष 190 बसों का टेंडर जब सरकार ने एनआईसी के सरकारी पोर्टल से करवाया तो रेट 26.92 रुपये प्रति किलोमीटर आ गया।
इस पर काफी विवाद हुआ। सरकार को भी प्रथम दृष्टया इसमें गड़बड़ी लगी और जांच राज्य विजिलेंस ब्यूरो को सौंप दी। आज भी 510 बसों वाले टेंडर की जांच विजिलेंस कर रही है। जिसमें रोडवेज विभाग के अफसर, कर्मचारी व कुछ ट्रांसपोर्टर राडार पर हैं।