शहीदी दिवस पर विशेष
-गदर पार्टी का प्रमुख नेता और अखबार के संपादक बने
-हथियार चलाने से लेकर बम बनाना और हवाई जहाज उड़ाना भी सीखा
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कंवरपाल
हलवारा। लुधियाना के गांव सराभा में बेहद धनी किसान मंगल सिंह ने 1912 में अपने इकलौते बेटे करतार सिंह सराभा को सुनहरे भविष्य और किसी अनचाहे नुकसान से बचाने के मकसद से अमेरिका पढ़ने भेजा था लेकिन मंगल सिंह की सोच और योजना से परे करतार सिंह अमेरिका जाकर आजादी की लड़ाई में ही कूद पड़े। बंगाल के खुदी राम बोस (18) के बाद उनका नाम भी कम उम्र में शहीद होने वाले क्रांतिकारियों में शुमार है।
करतार सिंह सराभा ने 19 वर्ष की छोटी आयु में हंसते हंसते फांसी का फंदा चूम लिया था। लाहौर केंद्रीय कारावास षड्यंत्र केस में 27 क्रांतिकारियों को फांसी की सजा सुनाई गई थी जिनमें करतार सिंह सराभा भी शामिल थे। सराभा वासी शहीद करतार सिंह सराभा को बाला शहीद और बाबा जी के नाम से भी पुकारते हैं। देश की आजादी की लड़ाई में योगदान के लिए सबसे बड़े नाम में से एक शहीद भगत सिंह भी शहीद करतार सिंह सराभा को अपना गुरु मानते थे और अपने परिवार या भगवान की जगह करतार सिंह सराभा की फोटो हमेशा अपनी जेब में रखते थे। शहीद करतार सिंह सराभा की 110वीं बरसी पर रविवार को भव्य सरकारी समागम का आयोजन किया गया। शहीद करतार सिंह सराभा की पुश्तैनी हवेली को संरक्षित करके सरकार ने पुरातत्व विभाग को सौंप दिया है लेकिन 150 साल पुरानी हवेली आज भी मिसाल के तौर पर कायम है। उस दौर में पढ़ाई के लिए विदेश जाने वालों को देश के अमीर परिवारों की श्रेणी में गिना जाता था। लुधियाना के मालवा खालसा हाई स्कूल से मिडिल और ओडिशा के कटक से 10वीं की पढ़ाई के बाद करतार सिंह को 1912 में पिता मंगल सिंह और मां साहिब कौर ने अमेरिका के सैनफ्रांसिस्को स्थित बर्कले यूनिवर्सिटी में उच्च शिक्षा के लिए भेजा। विदेश में भारतीयों के अपमान ने करतार सिंह के दिल को गहरी ठेस पहुंचाई। 1913 में जब वो 15 वर्ष के थे तो गदर पार्टी से जुड़ गए और 18 के होने तक पार्टी के लीडर बन गए। गदर पार्टी के संस्थापक सोहन सिंह भकना के व्यक्तित्व ने करतार सिंह सराभा को बहुत प्रभावित किया। करतार सिंह सराभा की सकारात्मक ऊर्जा के कारण सोहन सिंह भकना भी उन्हें बाबा जरनैल पुकारने लगे। अमेरिका में ही आजादी की लड़ाई को धार देने के लिए करतार सिंह ने बतौर संपादक गदर अखबार शुरू किया और भेष बदल अखबार बांटने के अलावा देश की आजादी संबंधी जोशीले नारे लिखकर पर्चे फेंकने लगे।
अमेरिका में ही करतार सिंह सराभा ने हथियार चलाना बम बनाना और हवाई जहाज उड़ाना भी सीख लिया। 1915 में गदर पार्टी के कई कार्यकर्ताओं के साथ देश की आजादी की लड़ाई सीधे तौर पर लड़ने के लिए अमेरिका से कोलंबो के रास्ते पानी के जहाज पर कलकत्ता आ गए। गदर पार्टी की योजना कम से कम 20 हजार आजादी के परवानों को लामबंद करने की थी। मुखबिर किरपाल सिंह ने अंग्रेज रिसालदार गंडा सिंह को करतार सिंह और अन्य गदरियों के ठिकाने की सूचना दे दी। करतार सिंह सराभा और हरनाम सिंह टुंडीलाट को अंग्रेज पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। विष्णु गणेश पिंगले, जगत सिंह, हरनाम सिंह सियालकोटी टुंडीलाट, बख्शीश सिंह, सुरैन सिंह (छोटा) और सुरैन सिंह (वड्डा) और करतार सिंह सराभा को एक साथ फांसी दे दी गई। करतार सिंह सराभा की छोटी आयु को देखते हुए अंग्रेजों ने उन्हें लिखित में रहम की अपील करने को कहा, लेकिन आजादी के परवाने शेरदिल करतार सिंह सराभा ने रहम की अपील ठुकरा दी और हंसते हंसते फांसी चढ़ गए।