वो अपने मां-बाप का लाडला था, लेकिन उसकी बहादुरी और शहादत ने उसे गांव का लाडला बेटा बना दिया।
दुश्मन की गोली लगने के बाद भी उसने कदम पीछे नहीं हटाए, बल्कि तब तक दुश्मनों से जंग लड़ता रहा, जब तक जिस्म की आखिरी सांस खर्च नहीं हो गई। उम्र थी महज 23 साल, जिस उम्र में नौजवान घोड़ी चढ़ने के सपने देखते हैं, उस उम्र में ढाणी डुल्ट का मनोहर लाल 18 जून 1999 को तिरंगे को सीने से लगाकर चार कंधों पर शान से अपने गांव पहुंचा था।
अफसोस बस इतना था, परिवार और गांव वालों ने अपने उस बहादुर बेटे को आखिरी बार देखा था। उस दिन अग्नि में समाने से पहले वह नौजवान अपना और अपने खानदान का नाम फतेहाबाद के इतिहास में स्वर्णाक्षरों से लिख गया था। मनोहर की शहादत के 17 बरस बाद परिजनों को सरकार से गिला तो कुछ नहीं है लेकिन बेटे की प्रतिमा फतेहाबाद में लगाने की हसरत आज तक दिल में दबी है, जिसे कोई अफसर सुनना नहीं चाहता।
लेफ्टिनेंट की परीक्षा कर चुका था पास, शहादत के बाद पहुंचा ज्वाइनिंग का लेटर
29 अप्रैल 1995 को सेना में बतौर सिपाही भर्ती हुआ मनोहर लाल सेना में एक अधिकारी बनकर अपने दादा और पिता का नाम और रोशन करना चाहता था। फौज में जाने की प्रेरणा उसे अपने दादा छाजूराम से ही मिली जो खुद फौज में रह चुके थे।
सेना में अफसर बनने की उसकी ललक के कारण उसने पूरी तैयारी की और एनडीए की परीक्षा को पास भी किया। इस बीच कारगिल में लड़ाई छिड़ गई। कारगिल के द्रास सेक्टर में पाकिस्तानी घुसपैठियों को मुंहतोड़ जवाब देते हुए 13 जून 1999 को फतेहाबाद का यह वीर जवान शहीद हो गया। परिजनों की आंखों से आंसू नहीं रुके थे जब वीरगति को प्राप्त होने के बाद मनोहर का बतौर लेफ्टिनेंट ज्वाइनिंग लेटर उनके हाथों में पहुंचा। शहादत के पांच दिन बाद मनोहर का अंतिम संस्कार पैतृक गांव ढाणी डुल्ट में ही हुआ था।