भूत-प्रेत और अंधविश्वास के जाल में किस तरह से लोग फंस जाते हैं, इसका एक उदाहरण टैगोर थिएटर में देखने को मिला।
नाटक कादंबिनी में कलाकारों के अभिनय के साथ लाइट और म्यूजिक का ऐसा कांबिनेशन बन गया कि दर्शकों के रोंगटे खड़े हो गए।
नाटक एक कादंबिनी नाम की विधवा के इर्द-गिर्द घूमता है। वह जमींदार की छोटी बहु है। जमींदार उसे बेहोश होने पर ही मरा हुआ मान लेता है।
जमींदार ने इलाज न करने कराने की बदनामी से डरकर अपने नौकरों को रात को ही अंतिम संस्कार करने के लिए भेज दिया।
रास्ते में जब कादंबिनी के दिल की धड़कने चलने लगीं तो नौकर उसे भूत समझकर भाग गए। कादंबिनी के घर जाने पर किसी ने भी यकीन नहीं किया कि वह वह जिंदा है।
सब उसे भूत समझते रहे। कादंबिनी ने खुद को जिंदा साबित करने के अनेक जतन भी किए। अंत में उसने छत से छलांग लगा कर जान दे दी। मौत के बाद सभी मान गए कि वह सच बोल रही थी।
हॉरर इनपुट से नाटक से हुआ मजेदार
नाटक में हॉरर इनपुट ने इसको वास्तविकता का पुट ला दिया। नाटक का निर्देशन कुलदीप शर्मा ने किया। कादंबिनी का रोल उपासना, जमींदार का मुकेश शर्मा, सहेली का अंजलि सिंह, सहेली के पति का कुलदीप शर्मा, नौकर का यशपाल, करुण गुलजार, वरुण, जसप्रीत और बुजुर्ग का रोल रिटायर्ड सेशन जज केके डोडा ने निभाया।