चंडीगढ़ के नाटकों में आजतक जापानी लोकनृत्य काबुकी नहीं हुआ। इसलिए सोचा कि इसे अपने नाटक में जगह दी जाए। यह बात चंडीगढ़ के रंगकर्मी अमित सनोरिया और सरवर अली ने टैगोर थिएटर-18 में कही।
दोनों ही आज पंजाब कला भवन के ओपन एयर थिएटर में अपने निर्देशन में नाटक बारह सो छब्बीस बटा सात को प्रदर्शित करेंगे।
इस नाटक का आयोजन सात्विक आर्ट सोसाइटी और इंपेक्ट आर्ट्स के सौजन्य से किया जा रहा है। इस कड़ी में दो नाटक का आयोजन होगा, जिसमें शनिवार को बारह सो छब्बीस बटा सात और रविवार को जाती ही पूछो साधू की नाटक का आयोजन होगा।
अमित ने कहा कि यह नाटक मोहन राकेश की लिखी कहानी परमात्मा का कुत्ता के ऊपर आधारित है, जिसमें फैज अहमद फैज की लिखी नजम कुत्ते का भी प्रयोग किया गया है। सरवर ने कहा कि इस नाटक को आज के युग के साथ जोड़ा गया है जहां एक सरकारी काम को करवाने के लिए आम आदमी को कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं।
उन्होंने बताया कि कहानी में मूल रूप से कुछ छेड़छाड़ नहीं की है, इसलिए किरदार का नाम भी उसकी फाइल का रखा गया है जो बारह सो छब्बीस बटा सात है।
फेस्टिवल के दूसरे नाटक के बारे में उन्होंने बताया कि फेस्टिवल के दूसरे दिन रविवार शाम को विजय तेंदुलकर के लिखे नाटक जाती ही पूछो साधू की का मंचन होगा। उन्होंने कहा कि क्योंकि नाटक में वयस्कों से जुड़ी भाषा का प्रयोग ज्यादा है इसलिए इस नाटक को सिर्फ वयस्कों के लिए ही रखा जाएगा।
नाटक की कहानी के बारे में बताते हुए अमित ने बताया कि नाटक एक ऐसे आदमी की जिंदगी के इर्द गिर्द घूमता है जो अच्छी शिक्षा के बावजूद भी छोटी जात का होने के कारण नौकरी नहीं ले पाता इस नाटक का निर्देशन आत्म प्रकाश मिश्रा ने किया है।
काबुकी नृत्य के लिए बारह दिन ट्रेनिंग
सरवन ने बताया कि वह मध्य प्रदेश स्कूल ऑफ ड्रामा से थिएटर के गुर सीख चुके है, जहां वह काबुकी और कई तरह के अंतरराष्ट्रीय नृत्य की भी ट्रेनिंग ली। उन्होंने बताया कि क्योंकि नाटक में किरदार करने वाले लोकल आर्टिस्ट ज्यादातर अमेच्योर है इसलिए उन्हें काबुकी नृत्य की स्पेशल ट्रेनिंग देनी पड़ी जो पहले छह दिन बॉडी लेंगवेज पर आधारित थी और अगले छह दिन संगीत के साथ नृत्य का तालमेल।
क्या है काबुकी नृत्य
काबुकी जापान का लोकनृत्य है, जिसमें चेहरे पर आदिवासियों की तरह रंग पोत कर नृत्य किया जाता है। जापान में काबुकी थिएटर भी होता है, जिसमें नृत्य और अदाकारी दोनो ही की जाती है।