टैगोर थिएटर में जाति ही पूछो साधु की नाटक का मंचन किया गया। यह नाटक डिपार्टमेंट ऑफ कल्चरल अफेयर्स, चंडीगढ़ प्रशासन और टैगोर थिएटर सोसाइटी की ओर से करवाया गया। इसमें जाति और वर्तमान शिक्षा प्रणाली के बाजारीकरण पर कटाक्ष किया गया।
नाटक की कहानी महीपथ नामक एक आदमी के इर्द-गिर्द घूमती है। वह लेक्चरार बनना चाहता है, लेकिन दौलत के आभाव व बड़ी सिफारिश न होने के चलते किसी भी सरकारी और प्राइवेट कॉलेज में उसे नौकरी नहीं मिलती। जब भी वह किसी इंटरव्यू में जाता तो नीच जाती का होने का कारण उसे रिजेक्ट कर दिया जाता। इंटरव्यू में विषय से संबंधित प्रश्न पूछने के बजाए उससे उसकी जाती से संबंधित सवाल जवाब किए जाते। थोड़ी मशक्कत करने के बाद उसका सपना साकार हो जाता है और वह एक प्राइवेट कॉलेज में लेक्चरार बन जाता है। वहां उसका सामना भवना नाम के एक शरारती बच्चे से होता है, लेकिन महीपथ का स्वभाव उस बच्चे को बदल देता है। धीरे-धीरे दोनों में गहरी दोस्ती हो जाती है।
एक दिन कॉलेज कमेटी का चेयरमैन अपनी भतीजी नलिनी को लेक्चरार बनाकर कॉलेज ले आता है। नलिनी और महीपथ एक दूसरे से प्यार करने लगते है। इसकी भनक कॉलेज प्रिंसिपल को लग जाती है और वह चेयरमैन को इस बारे में सब कुछ बता देता है। चेयरमैन महीपथ को उसकी जाति पर काफी बुरा भला कहता है और नलिनी की मौसी पूतना को कॉलेज ले आता है। महीपथ नलिनी को हर हाल में पाना चाहता है और उसे भगा कर ले जाने की योजना बनाता है। इसमें उसका साथ शरारती बच्चा भवना देता है। लेकिन गल्ती से भवना नलिनी की बजाए पूतना मौसी को उठाकर ले आता। जब चेयरमैन को इसकी जानकारी मिलती है तो महीपथ की काफी पिटाई होती है और नलिनी भी उसका साथ छोड़ देती है।
नाटक के अंत में वह नलिनी को तो खो ही देता है साथ ही में नौकरी से भी हाथ धो बैठता है। एक घंटे और बीस मिनट के इस नाटक में रोहतक के थिएटर ग्रुप एक्शन थिएटर सोसाइटी के 8 कलाकारों ने अपनी कला का प्रदर्शन किया। इस नाटक का निर्देशन दुष्यंत ने किया।