मास्टर गुरबंता सिंह ने चौधरी संतोख सिंह को शिक्षा दिलाकर पेशे से वकील बनाया लेकिन पिता की सियासत व विरासत को संभालने के लिए चौधरी संतोख सिंह को सक्रिय राजनीति में आना ही पड़ा।
सांसद चौधरी ने 1978 में अपना राजनीतिक सफर पंजाब युवा कांग्रेस नेता के तौर पर शुरू किया।
1978 से 1982 तक वह पंजाब युवा कांग्रेस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष रहे। 1987 से 1995 तक जिला कांग्रेस कमेटी ग्रामीण के अध्यक्ष बने। 1992 में पहली जीत दर्ज करने के बाद पंजाब कांग्रेस विधायक दल के महासचिव के रूप में चुने गए। 1992 से 1995 तक ग्रामीण विकास और पंचायतों के प्रभारी, संसदीय कार्य और विद्युत विभाग के मुख्य संसदीय सचिव बने।
बाद में उन्हें पंजाब सरकार में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण और खाद्य और नागरिक आपूर्तार मंत्री, कैबिनेट मंत्री रहे। वह हमेशा फिल्लौर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ते थे और उसी हलके में शनिवार को उनहोंने अंतिम सांस ली।
2014 में उनहोंने जालंधर से लोकसभा चुनाव लड़ा और मोदी लहर को जालंधर में शिकस्त देकर जीत हासिल की। 2019 में भी जब देश में पीएम नरिंदर मोदी की आंधी चल रही थी तब भी चौधरी संतोख सिंह ने जीत हासिल की। चौधरी संतोख सिंह हमेशा दलितों की शिक्षा व उनके लिए सेहत सुविधाओं को लेकर अग्रणी रहते थे।
हमेशा कहते थे कि पिता मास्टर गुरबंता सिंह दलितों को शिक्षित करने के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया, उनकी राह पर चलते हुए दबे व कुचले हुए लोगों को शिक्षित करना मेरा भी फर्ज है। हमेशा उन लोगों को मास्टर गुरबंता सिंह के किस्से सुनाते थे, जो अपने बच्चों को पढ़ाने से इंकार करते थे।
उनकी पत्नी डॉ. कर्मजीत चौधरी डायरेक्टर उच्च शिक्षा के पद से रिटायर हो चुकी हैं और वह भी चौधरी संतोख सिंह के साथ मिलकर दलितों की शिक्षा के लिए अग्रणी व कंधे से कंधा मिलाकर चलती आ रही हैं।चौधरी संतोख सिंह के बेटे बिक्रमजीत सिंह चौधरी भी फिल्लौर से विधायक हैं, जिनहोंने अपने पिता की सियासी विरासत व उनके विधानसभा हलके को संभाला है।