चंडीगढ़। अयोध्या में विवादित ढांचा गिराए जाने के मामले में बुधवार को आए फैसले पर शहर के उन स्वयंसेवकों ने खुशी जताई है जो राम मंदिर आंदोलन का हिस्सा थे। फैसला आने के बाद स्वयंसेवकों ने कहा कि अदालत के फैसले से वह काफी खुश हैं। 28 साल बाद उनकी मेहनत सफल हो गई।
बता दें कि वर्ष 1992 में नवंबर माह के आखिर में शहर से कई जत्थे अयोध्या के लिए रवाना हुए थे, जिनमें दसवीं कक्षा में पढ़ने वाले युवा से लेकर भाजपा नेता तक शामिल थे। आरएसएस के कई स्वयंसेवक भी घर पर बिना बताए अयोध्या के लिए निकल गए थे। अयोध्या जाने वाले लोगों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा। उन्हें परिवार व पड़ोसियों की तरफ से डराया गया। कहा गया कि वहां पर गोलियां चल रही हैं, वापस आना मुश्किल है। बावजूद इसके कई लोग अयोध्या गए। उनमें से कई लोगों का अब देहांत हो चुका है, जबकि कई आज भाजपा में बड़े पद पर काबित हैं।
प्रभु राम के मंदिर के लिए निकल पड़े थे घर से
हम 29 नवंबर को अयोध्या जाने के लिए घर से निकले थे। हमारे जत्थे में करीब 50 लोग शामिल थे। हमसभी वहां पर करीब 8 दिन रहे। जिस वक्त मैं प्रभु श्रीराम के काम के लिए घर से निकला था, मेरी उम्र महज 21 वर्ष थी। घर से निकलते वक्त सिर्फ एक ही ख्याल मन में था कि प्रभु राम के मंदिर के लिए निकले हैं। इस काम के दौरान अगर कुछ हो भी जाता है तो वह प्रभु की मर्जी होगी। अब करीब 28 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला दिया है। इस फैसले का स्वागत है। कांग्रेस सरकार ने बेवजह भाजपा ने नेताओं को फंसाया था।
- सतिंदर सिंह, पूर्व पार्षद
जय श्रीराम का नारा लगाने पर आगरा जेल में किया बंद
उन दिनों हर ओर राम नाम की लहर थी। हम लोगों को बहुत डराया गया, रोका गया कि वहां पर गोलियां चल रही हैं लेकिन राम मंदिर के लिए हमें सबकुछ मंजूर था। 26 अक्तूबर को हम चंडीगढ़ से बस में बैठकर दिल्ली पहुंचे। दिल्ली से ट्रेन में बैठे तो टुंडला रेलवे स्टेशन पर हमें रोक लिया गया। स्टेशन पर भारी पुलिस बल तैनात था। हमारे कुछ सहयोगियों ने जय श्रीराम का नारा लगाया तो पुलिस वालों ने गिरफ्तार कर लिया और ले जाकर आगरा जेल में बंद कर दिया। 10 दिनों तक हमें वहां प्रताड़ित किया गया। अदालत के फैसले का स्वागत है। अब जल्द ही मंदिर भी बन जाए, यही ख्वाहिश है।
- हरिशंकर मिश्रा, पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष, भाजपा
दसवीं में पढ़ रहा था जब भाई के साथ निकल पड़ा अयोध्या
मैं उस वक्त 10वीं कक्षा में पढ़ता था। संघ से जुड़ा था, शाखा जाता था तो मन में इच्छा थी कि प्रभु राम के लिए कुछ करना है। सूचना मिली कि चंडीगढ़ से कुछ लोग अयोध्या जा रहे हैं। मेरे बड़े भाई भी जा रहे थे तो मैं भी उनके साथ निकल गया। 2 अक्तूबर 1992 को पिता का देहांत हुआ था। बावजूद इसके हम दोनों भाई 30 नवंबर को अयोध्या के लिए निकल गए थे। वहां सेवा की और 8 दिसंबर को लौटे। बड़े भाई अब नहीं रहे। 28 साल बाद हमें याद किया और सम्मानित किया। फैसले का स्वागत है।
- नितिन, स्वयंसेवक
अपनी जिम्मेदारी पर बापूधाम के सात लोगों को लेकर गया था अयोध्या
मेरे पास उन दिनों बजरंग दल के प्रदेश उप प्रधान की जिम्मेदारी थी। बापूधाम से सात लोग अयोध्या के लिए गए थे। सभी के माता-पिता को बताया था। सभी मेरी जिम्मेदारी पर गए। हमें घर वालों, पड़ोसियों ने बहुत डराया कि वहां मारे जाओगे, गोलियां चल रही हैं लेकिन हम नहीं रुके और राम का नाम लेकर सभी निकल पड़े। रास्ते में कई परेशानियां आईं लेकिन राम का काम किया और फिर वापस लौटे। आज उन सात लोगों में से कइयों का देहांत हो चुका है लेकिन अदालत के फैसले से संतुष्टि मिली है। मेहनत रंग लाई है।
- सुरजीत, भाजपा कार्यकर्ता