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Chandigarh News: आइसर के वैज्ञानिकों ने ढूंढी दवा, अब कोरोना वायरस नहीं पहुंचा सकेगा नुकसान

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शोध में ढूंढे पांच कंपाउंड, आईआईटी रोपड़, सीएसआईआर-इमटेक चंडीगढ़, आईआईएससी बंगलूरू ने की मदद
दवा मानव फेफड़े की कोशिशओं व चूहों पर 95 प्रतिशत से अधिक कारगर
सुरक्षा कवच बनाकर दवा वायरस को नहीं घुसने देगी मानव कोशिकाओं में

माई सिटी रिपोर्टर
मोहाली। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च (आइसर) मोहाली के वैज्ञानिकों के हाथ बड़ी सफलता लगी है। आईआईटी रोपड़, सीएसआईआर-इमटेक चंडीगढ़, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (आईआईएससी) बंगलूरू के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर आइसर के वैज्ञानिक डॉ. इंद्रनील बनर्जी की टीम ने कोरोना से बचाव की दवा ढूंढने में सफलता हासिल की है।

इस टीम ने अपने शोध में पांच ऐसे कंपाउंड ढूंढे जो कोरोना और एन्फल्यूएंजा सहित कई अन्य सभी वायरस को मानव कोशिकाओं में घुसने से पहले ही रोक देंगे। ऐसे में इन वायरस का मानव शरीर पर कोई असर नहीं पड़ेगा। खास बात यह है कि शोध में तैयार दवा मानव फेफड़ों की कोशिकाओं और चूहों पर 95 प्रतिशत से अधिक कारगर साबित हुई है। अब इसे मंजूरी के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय को भेजा गया है।
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वर्ष 2019 में कोरोना की शुरुआत के साथ ही आइसर के वैज्ञानिकों ने इसका तोड़ निकालने के लिए शोध कार्य शुरू कर दिया था। वैज्ञानिकों ने देखा कि वायरस से होने वाली बीमारी के उपचार के लिए कुछ एंटी वायरल दवाइयां और टीके बाजार में उपलब्ध हैं लेकिन कोरोना वायरस तेजी से अपना स्वरूप बदल लेता है, इस कारण दवा और टीका बनाया जाता है, वह सिर्फ उन्हीं स्वरूपों पर कारगर होता है, जिनके लिए बनाया गया था। स्वरूप के बदलने पर उस दवा या टीके का असर कम या कई बार नाममात्र का रह जाता है। इस समस्या से निपटने के लिए विश्व भर में वैज्ञानिक शोध में जुटे हुए थे।

साढ़े तीन साल शोध के बाद मिली सफलता
डॉ. इंद्रनील बनर्जी ने बताया कि संस्थान में पीएचडी के छात्र निर्मल कुमार ने अपने शोध के दौरान इस विषय पर गहनता से अध्ययन किया। जब उन्हें लगा कि इस प्रकार दवा खोजी जा सकती है तो 13 वैज्ञानिकों की टीम ने मिलकर सबसे पहले चूहे की कोशिकाओं पर इन कंपाउंड का परीक्षण किया। उसमें सफलता मिलने के बाद मानव फेफड़ों की कोशिकाओं पर इसका असर देखा गया। इस पूरे शोध में करीब साढ़े तीन साल लगे। इस सफलता के बाद आइसर ने अब मानव पर पूरी तरह परीक्षण के लिए अपने शोध को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को सौंप दिया है।

होस्ट डायरेक्टेड थैरेपी के सिद्धांत पर काम करेगी दवा
डॉ. बनर्जी ने बताया कि पहले डायरेक्ट एक्टिंग एंटीबॉयटिक्स (डीएए) के सिद्धांत पर दवा बनाई जाती थी जो कुछ समय बाद बेअसर हो जाती थी। उसकी वजह वैज्ञानिकों ने माना है कि जब दवा लेते हैं तो उस वायरस के खिलाफ शरीर के अंदर रोग प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न होती है लेकिन बार-बार एंटी वायरस दवा लेने से रोग प्रतिरोधक क्षमता बननी कम हो जाती है। इसके लिए उन्होंने एंटी एन्फल्यूएंजा दवा टेमीफ्लू पर अध्ययन किया तो पाया कि यह दवा धीरे-धीरे वायरस को खत्म करने का अपना असर कम कर रही है। इसके बाद इन कंपाउंड को खोजा गया जो होस्ट डायरेक्ट थैरेपी (एचडीटी) पर काम करेंगे। मानव शरीर वायरस के लिए होस्ट (घर) का काम करेगा लेकिन इन कंपाउंड से तैयार दवा वायरस से शरीर की कोशिकाओं के ऊपर सुरक्षा कवच बना देगी।

40 कंपाउंड पर शोध करके खोजे ये पांच कंपाउंड
वैज्ञानिकों ने डाफिनाइल यूरिया डेरवेटिव (डीपीयूडी) के 40 कंपाउंडों पर शोध किया। इसके बाद पांच ऐसे कंपाउंड (डीपीयूडी-1, 2, 16, 20 और 23) ढूंढे जो कोरोना समेत कई प्रकार के वायरस की रोकथाम में कारगर हैं। ये कंपाउंड वायरस को कोशिका के अंदर घुसने से ही नहीं देंगे। इससे वह न तो अपनी संख्या बढ़ा पाएगा और न ही अपने स्वरूप में बदलाव कर पाएगा। इसके साथ ही वह मानव शरीर पर अपना असर भी नहीं दिखा पाएगा।
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इन वैज्ञानिकों ने खोज में दिया योगदान
डॉ. इंद्रनील बनर्जी, डॉ. प्रबल बनर्जी, डॉ. राजेश पी. रिंगे, डॉ. निर्मल कुमार, डॉ. इरशाद माजिद, डॉ. चरणदीप सिंह, डॉ. साहिल कुमार, डॉ. राजू एस राजमणि, डॉ.देबाज्योति चक्रवर्ती, डॉ. अंशुल शर्मा, डॉ. प्रियंका सिंह, डॉ. कृष्ण गोपाल ठाकुर, डॉ. राघवन वर्धराजन।
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