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विश्व दिव्यांग दिवस: शारीरिक रूप से अक्षम, हौसले से बुलंद लोगों ने दिखाया-दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं 

Fri, 03 Dec 2021 12:54 PM IST
निवेदिता वर्मा सीमा एस आनंद, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

आज वर्ल्ड डिसएबल डे है। इस मौके पर हम आपको ऐसे जिंदादिल लोगों से रूबरू करवा रहे हैं, जिन्होंने कभी शारीरिक अक्षमता को आगे नहीं आने दिया और बुलंद हौसले से मंजिल हासिल की। 
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राजू बंसल, देवेंद्र मोहन, जितिन बिश्नोई और सत्यवीर डागर। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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दु:ख-सुख सब कहं परत है, पौरुष तजहु न मीत। मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। अर्थात् दु:ख और सुख तो सभी पर पड़ा करते हैं, इसलिए अपना पौरुष मत छोड़ो, क्योंकि हार और जीत तो केवल मन के मानने अथवा न मानने पर ही निर्भर है, अर्थात मन के द्वारा हार स्वीकार किए जाने पर व्यक्ति की हार सुनिश्चित है। ये पंक्तियां इनके लिए सही चरितार्थ होती हैं। शारीरिक रूप से अक्षम, लेकिन हौसले से बुलंद लोगों ने दिखा दिया है कि इस दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं है।

खुद ड्राइव कर अपने ससुराल मुंबई जाते हैं राजू बंसल 

सेक्टर-32ए में माइक्रोबायल लैब में कार्यरत राजू बंसल की बचपन में पोलियो के कारण उनकी दोनों टांगें पोलियोग्रस्त हो गईं। इसके बाद शुरू हुआ संघर्ष, कई बार तो वे स्कूल तक नहीं जा पाते थे, लेकिन उन्होंने पढ़ना नहीं छोड़ा। उनका कहना है कि जिंदगी में उतार चढ़ाव तो लगे रहते हैं, हौसला नहीं छोड़ना चाहिए। उनकी पत्नी भी बचपन में पोलियो के कारण बिना छड़ी के सहारे नहीं चल पातीं, लेकिन दोनों खुद को अक्षम नहीं मानते और वे हर काम कर सकते हैं। राजू बंसल का ससुराल मुंबई में है, जहां वे साल में एक बार जरूर जाते हैं और वह भी खुद ड्राइव करके। उन्होंने कहा कि सरकार को भी ऐसे लोगों के लिए कुछ सोचना चाहिए। पार्किंग में गाड़ी तो लगा लेते हैं, लेकिन वहां से मार्केट और मॉल तक जाने के लिए कोई व्हीलचेयर नहीं होती, उस समय खुद को बेबस पाते हैं। एलांते में अब 30-40 व्हीलचेयर हो गई हैं। बाकी जगह भी ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए। 

देवेंद्र मोहन बायीं टांग से चलाते हैं गाड़ी 

बचपन में पोलियो के कारण 58 वर्षीय देवेंद्र मोहन की दायीं टांग ने काम करना बंद कर दिया। उसके बाद बायीं टांग से ही सब काम करने शुरू किए। उनका कहना है कि मन के हारे हार है, इसलिए उन्होंने कभी हार नहीं मानी। इसी का नतीजा है कि वे जिला अदालत में सुपरिंटेंडेंट ज्यूडिशियल ग्रेड वन रीडर हैं। उनका कहना है कि स्टाफ बहुत कोऑपरेटिव है। वे जयपुर, आगरा और हिमाचल तक खुद गाड़ी ड्राइव कर जाते हैं। देवेंद्र मोहन राबर्ट एम हेंसेल के कथन ‘आई चूज नॉट टू प्लेस दिस इन माई एबिलिटी’ से प्रेरित हैं।

जितिन कुमार बिश्नोई ने ताइक्वांडो और दौड़ को बनाया पैशन 

जितिन कुमार बिश्नोई मसल्स स्टिफनेस, दायी आंख से कम दिखना, शरीर का बायां हिस्सा कमजोर और हाथ की ग्रिप न बन पाना जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। जितिन ने पैरा एथलीट को चुना। उन्होंने एमएससी और एमबीए किया है। 33 वर्ष की उम्र तक भी कोई जॉब नहीं मिली, एक दिन अपनी मां से बोले कि मेरा शरीर तो चल सकता है। मां एकदम डर गईं, बोलीं- तू क्या सोच रहा है। तब जितिन ने कहा कि वह स्पोर्ट्स में जाना चाहते हैं। मां ने कहा कि वह उसके साथ है। वह रोजाना सेक्टर- 8 के पंचकूला से सेक्टर-48 चंडीगढ़ खुद ड्राइव कर जाते हैं। नेशनल खेल चुके जितिन को ताइक्वांडो में गोल्ड मिल चुका है। जितिन ने साउथ अफ्रीका के मुरोका में 200 मीटर की दौड़ में भी भाग लिया। अब वह देवेंद्र सिंह और हरजिंदर सिंह की निगरानी में ताइक्वांडो की ट्रेनिंग ले रहे हैं। 

सरकार को शारीरिक रूप से अक्षम लोगों को उनका हक देना चाहिए : सत्यवीर डागर

पीजीआई में नर्सिंग ऑफिसर के पद पर कार्यरत सत्यवीर डागर का कहना है कि जब वे दो साल के थे तो उन्हें पोलियो हो गया था। उन्होंने मेडिकल साइंस ली, नर्सिंग का डिप्लोमा किया, लेकिन नौकरी में सिलेक्शन के समय उन्हें मना कर दिया जाता था। एक बार तो उन्होंने नौकरी देने वाले द्वारा मना करने पर बताया कि वे एक रात में गोवर्धन की परिक्रमा पूरी कर सकते हैं तो जॉब कैसे नहीं कर पाएंगे। तब उन्हें फरीदाबाद के अस्पताल में नौकरी मिली, लेकिन पीजीआई में नौकरी मिलने पर वे यहां आ गए। उनकी पीजीआई में सिलेक्शन के समय ही सेक्टर- 32 अस्पताल और एम्स में भी चयन हो गया। उनका कहना है कि शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के लिए सीटों के लिए उन्होंने लड़ाई लड़ी, तब पीजीआई में 2012 में 17 सीट आरक्षित हुईं।  

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