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Exclusive: जनरल करिअप्पा को भी बर्दाश्त नहीं था सेना का राजनीतिकरण, रिपोर्ट

Tue, 12 Dec 2017 09:08 AM IST
मोहित धुपड़/अमर उजाला, चंडीगढ़
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फाइल फोटो
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सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत ने सेना के राजनीतिकरण को लेकर बयान दिया, लेकिन जनरल करिअप्पा को भी बर्दाश्त नहीं था राजनीतिकरण। जनरल रावत के बयान को लेकर बीते दिनों दिए बयान ने भले ही सियासी गलियारों का माहौल गरमा दिया हो, लेकिन आजादी के बाद से ही सेना अपनी कार्यप्रणाली में किसी भी तरह का अनावश्यक राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं चाहती थी।
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इसे लेकर पहले सैन्य प्रमुख एवं कमांडर इन चीफ फील्ड मार्शल जनरल केएम करिअप्पा भी खासे सख्त थे। बतौर सेना प्रमुख उन्होंने 67 साल पहले ही सन 1950 में तत्कालीन सेना के सभी अफसरों को व्यक्तिगत खत लिखकर राजनीतिक मिश्रण से दूर रहने के लिए आगाह किया था। इस खत में उन्होंने राजनीति और सेना को किस तरह से अलग रखा जाए, इस बात की व्याख्या करते हुए साफ कहा था कि सैन्य अफसर यदि राजनीति में पड़े तो न सरकार के वफादार रह पाएंगे और न ही जनता के।

67 साल पूर्व सैन्य प्रमुख करिअप्पा के इस खत के उस वक्त भी बड़े मायने थे और आज भी। अब मौजूदा सैन्य प्रमुख विपिन रावत के सैन्य राजनीतिकरण संबंधी बयान ने यह साबित कर दिया है कि सेना न पहले अपनी कार्यप्रणाली में राजनीति को बरदाश्त करना चाहती थी और न ही आज। प्रथम सैन्य प्रमुख करिअप्पा के इस महत्वपूर्ण खत को सेना ने अपने ऐतिहासिक दस्तावेज में सहेजकर रखा हुआ है। ये दस्तावेज चंडीगढ़ में चल रहे मिलिट्री लिटरेचर फेस्टिवल में प्रदर्शित किया गया था।
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करिअप्पा के खत के मुख्य अंश

general vipin rawat
‘कृपया कोई भी अफसर और जवान को राजनीति में मिश्रित नहीं होना है। याद रहे यदि आप लोग ऐसा कर पाए तभी आप न सरकार के वफादार भी रह पाएंगे और जनता के भी। यह भी याद रहे कि हम देश की जनता के लिए काम करते हैं और सरकार की ताकत भी जनता की वजह से ही है।

परंतु इसका मतलब यह भी कतई नहीं कि हम (जवान और अफसर) देश के एक नागरिक के रूप में राजनीतिक पार्टियों और उनके उद्देश्यों को नजरअंदाज करें। हमें एक अफसर और एक नागरिक के रूप में अपने दिमाग में अपने मत के अधिकार को भी स्पष्ट रखना होगा। देश की ताकत जनता के मनोबल पर भी निर्धारित करती है।

सेना के शूरवीर यदि मैदान-ए-जंग  लड़ते हैं, तो युद्ध में सफलता हासिल करना बहुत मुश्किल काम होता है। ऐसे में जवानों और जनता का मनोबल दोनों का मजबूत होना जरूरी है। देशवासियों और जवानों का मनोबल हमेशा बना रहे ये जिम्मेवारी सिर्फ अफसरों की ही नहीं, बल्कि सभी की यानी सरकार की भी है। मैं आप सभी (अफसरों) को बताऊंगा कि आपको ऐसा किस तरह करना है।’
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यह थे करिअप्पा

विपिन रावत - फोटो : SELF
फील्ड मार्शल केएम (कोडनडेरा माडाप्पा) करिअप्पा इंडियन आर्मी के फर्स्ट इंडियन कमांडर इन चीफ थे। सन 1947 में इंडो-पाक युद्ध के समय उन्होंने ही वेस्टर्न फ्रंट पर इंडियन फोर्स का नेतृत्व किया था। फील्ड मार्शल सेम मानेक शॉ  के अलावा जनरल करिअप्पा को ही सेना में फाइव स्टार रैंक प्राप्त था। केएम करिअप्पा को 1949 में इंडियन आर्मी का पहला कमांडर-इन-चीफ नियुक्त किया गया था। उनकी खासियत यह थी कि वे विभिन्न मुद्दों पर सेना के सभी अफसरों को व्यक्तिगत पत्र लिखकर उन्हे विभिन्न मसलों पर आगाह करते रहते थे।

राजनीति पर नजर हो, मगर दूर से
कोई भी आर्म्ड फोर्स चाहे आर्मी हो, एयरफोर्स या नेवी राजनीति को उससे कोसों दूर रहना है। हां, सैन्य अफसरों को मालूम हो कि राजनीति में क्या चल रहा है, मगर इस पर नजर दूर से ही रखी जाए। अफसर कभी इस विषय का न तो हिस्सा बने और न इस पर कुछ बोलें। क्योंकि सेना और राजनीति का कोई सीधा संबंध नहीं है। आज के राजनीतिक परिवेश में सैन्य प्रमुख विपिन रावत का बयान थोड़ा चिंताजनक है।
- लेफ्टिनेंट जनरल पीएन हून (रिटायर्ड)

युद्ध करें या प्रेक्टिस, राजनीति हमारा काम नहीं
सेना का काम युद्ध करना है। युद्ध नहीं प्रेक्टिस करना है, राजनीति करना सेना का काम नहीं। इसलिए राजनीतिज्ञ पालीटिक्स को आर्मी से दूर ही रखें तो सही रहेगा। सेना अपने कायदे और कानून से बंधी है, उसी अनुशासन में रहते हुए काम करें। सैन्य अफसरों का राजनीति से दूर रहना ही देश हित के लिए अच्छा है।
- बिग्रेडियर टीपीएस चौधरी (रिटायर्ड)

 
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