मान्यता थी कि अगर कोई महिला वाद्ययंत्र रुद्रवीणा बजाती है तो उसके संतान नहीं होती। इस मान्यता को तोड़ा ज्योति जी हेगड़े ने। देश की पहली महिला वादक ज्योति हेगड़े ने अमर उजाला से खास बातचीत के दौरान बताया कि आज मेरा एक बेटा है। कर्नाटक के धारवाड़ से 125 किलोमीटर दूर सिरसी गांव में रहने वाली रुद्रवीणा वादक ज्योति हेगड़े शनिवार को एक कार्यक्रम के सिलसिले में चंडीगढ़ आई थीं।
शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में अपने अनुभवों को साझा करते हुए ज्योति जी हेगड़े बतातीं हैं कि मैं 12 वर्ष की थी, जब पंडित बिंदू माधव पाठक से सितार की तालीम हासिल कर रही थी। एक दिन मैंने उन्हें रुद्रवीणा बजाते सुना। इसकी धुन ने मुझे काफी प्रभावित किया। यह सितार की धुन से अलग थी।
मैंने गुरुजी को इस वाद्ययंत्र को सिखाने के लिए कहा। लेकिन उन्होंने यह कहते हुए मना कर दिया कि इसे सिर्फ लड़के बजाते हैं, लड़कियां नहीं। मैंने अपने पिता से भी इसे सीखने के बारे में बात की, लेकिन गुरुजी ने उन्हें भी मना कर दिया। मेरे जिद करने पर उन्होंने मुझे रुद्रवीणा का शिक्षण देना शुरू कर दिया।
16 साल की उम्र से रेगुलर बजा रहीं रुद्रवीणा
रुद्रवीणा वादक ज्योति हेगड़े
- फोटो : अमर उजाला
16 साल की उम्र में मैंने नियमित रूप में रुद्रवीणा बजाना शुरू कर दिया। मैं दिन रात रूद्रवीणा का प्रशिक्षण लेती रही। 1981 में मुझे रुद्रवीणा के लिए आकाशवाणी की अखिल भारतीय संगीत स्पर्धा में पहला स्थान मिला। उसके बाद मैं ऑल इंडिया रेडियो की रैगुलर आर्टिस्ट बन गई। पंडित बिंदू माधव पाठक से मैंने ख्याल में रुद्रवीणा का वादन सीखा और पंडित इंदुधर निरोडी से द्रुपद में।
पंडित निरोडी से 3 साल तक तालीम हासिल करने के बाद, मैंने उस्ताद असद अली खां से 5 साल और शिक्षा ली। ज्योति जी हेगड़े बताती हैं कि इस वाद्ययंत्र का भार 6-7 किलो होता है। इसे बजाने में अधिक एनर्जी लगती है। इसके लिए वास्तविक पोजीशन वज्रासन है। वज्रासन की पोजीशन गर्भावस्था में यूटरस के लिए हानिकारक मानी जाती हैं। मां को जब इस बारे में पता चला तो उन्होंने मुझे इसे बजाने से मना कर दिया।
उस समय मेरा इसके साथ इतना गहरा लगाव हो गया था, कि मैं इसे छोड़ने के बारे में सोच भी नहीं सकती थी। तब पिताजी ने मेरा साथ दिया और मां को समझाया। आज मेरा एक बेटा भी है। लेकिन प्रेगनेंसी के समय वज्रासन में प्ले न कर पाने के कारण, मैं इसे सुखासन में प्ले करती थी। उसके बाद से ही मैं अभी भी इसे सुखासन में ही बजाती हूं।