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‘आधे-अधूरे’ में दिखाया एक स्त्री की अपूर्ण महत्वाकांक्षा

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चंडीगढ़। मोहन राकेश का चर्चित नाटक ‘आधे-अधूरे’ एक लंबे अरसे बाद चंडीगढ़ के पंजाब कला भवन में मंचित किया गया। इस नाटक का मंचन परंपरा आर्ट्स द्वारा पांच दिवसीय थियेटर फेस्टिवल के दौरान किया गया। इस फेस्टिवल का आयोजन चंडीगढ़ संगीत नाटक अकादमी, नार्थ जोन कल्चरल सेंटर पटियाला चंडीगढ़ और कल्चरल अफेयर्स चंडीगढ़ के सहयोग से किया जा रहा है। करीब 50 साल पहले लिखा गया ये नाटक मध्यम वर्गीय परिवार की कथा है। एक ऐसा मध्यमवर्गीय परिवार जो कि आर्थिक तंगी, कलह और रिश्तों की उलझनों में जकड़ा हुआ है। हर पात्र अपने आप में अधूरा है, लेकिन उसे एक पूर्ण साथी की अंतहीन तलाश है।
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नाटक की मुख्य पात्र सावित्री महेंद्रनाथ से प्रेम विवाह करती है। इसके बाद महेंद्र का व्यापार सही नहीं चल पाता और वह कुछ नहीं कर पाता। घर सावित्री की नौकरी से चलता है। सावित्री पति को बेकार, निकम्मा मानकर उसे कोई महत्व नहीं देती। दोनों एक-दूसरे से नफरत करते हैं, पर उनके लिए साथ रहना सामाजिक मजबूरी भी है। सावित्री को पति व्यक्तित्वहीन और दब्बू नजर आता है और वह किसी ऐसे पूर्ण आदमी की तलाश में उससे दूर होती जाती है जो उसकी कसौटियों पर खरा उतरे। उसके जीवन में चार और पुरुष आते हैं पर सभी आधे-अधूरे हैं।
इस परिवार में तीन बच्चे भी हैं। पति पत्नी के दरकते संबंधों का असर तीनों बच्चों पर भी पड़ता है और तीनों चिड़चिड़े और विद्रोही स्वभाव के हो जाते हैं। बड़ी लड़की अपनी मां के प्रेमी के संग भागकर शादी कर लेती है। उसका पति आर्थिक रूप से सक्षम है, लेकिन फिर भी वह उसके साथ खुश नहीं रह पाती। छोटी बेटी स्कूल में है पर उसे पढ़ाई से ज्यादा रुचि लड़कों में है और इन दोनों के बीच एक युवा बेटा है जो नौकरी नहीं करना चाहता और इस बात पर सवित्री से अक्सर उसका झगड़ा होता रहता है। ऐसी ही परिस्थितियों को दिखाता यह नाटक काफी खास रहा।
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