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पहली प्रस्तुति में मिले थे 101 रुपये, यह जिंदगीभर रहेगा याद : अली खान

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चंडीगढ़। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को सुंदर बनाने में बड़े गुलाम अली खान ने बड़ा काम किया है। भंगला, लाइट म्यूजिक, सूफी को सुनने के लिए हजारों की संख्या में लोग आते हैं लेकिन शास्त्रीय संगीत में उतने दर्शक नहीं आते। बड़े गुलाम अली खान साहब ने बड़ा काम किया है।
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यह बात उस्ताद बड़े गुलाम अली खान के पोते उस्ताद जवाद अली खान ने कहीं। वे सेक्टर-38 के रानी लक्ष्मीबाई महिला भवन में शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुति देने आए थे।
उन्होंने कहा कि बात 1978 की है जब वे मंच पर पहली बार गायन के लिए आए थे। मेहनताना के रूप में आयोजकों ने बंद लिफाफे में 101 रुपये दिए। वह हमेशा याद है।
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खास बात यह है कि उस कार्यक्रम में 100 दर्शक पहुंचे थे। उन्होंने कहा कि अपने दादा के गोद में बैठा हूं यह मुझे याद है, क्योंकि मेरे होश संभालने से पहले ही दादा दुनिया छोड़ चुके थे। उन्होंने कहा कि वे अपने चाचा से दादा की प्रेरणा देनेवाली बात सुनी। अपने चाचा से संगीत सीखी है।
हमारे चाचा मुनव्वर अली साहब बताते थे कि बड़े गुलाम अली खान साहब कहते थे कि संगीत एक तरह से प्रार्थना और इबादत है। इबादत के लिए बहुत ही शुद्ध मन से मंच पर आना चाहिए। मंच पर बैठो तो स्वयं को भगवान के प्रति समर्पण कर दो। प्रार्थना करो कि सुर और ज्ञान मिले।
मैं और मेरे बड़े भाई साथ साथ मंच पर गाते रहे। मेरे भाई 2021 में गुजर गए। यह हमारे लिए बहुत दुखद है। नए कलाकारों के बारे में कहा कि उनका भविष्य बेहतर है। शास्त्रीय संगीत पहले से अधिक सुना जा रहा है। इस संगीत में चैन है। यह बेहतरीन दोस्त है। यह स्वास्थ्य देता है।
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