- एक की रिहाई दूसरे के अधिकार में बाधा नहीं बन सकती
- पत्नी के पैरोल पर होने के आधार पर पति की अर्जी ठुकराना गैरकानूनी- सोनीपत के बंदी को 10 सप्ताह की नियमित पैरोल देने का आदेश
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि केवल इस आधार पर किसी दोषी की नियमित पैरोल नहीं रोकी जा सकती कि उसका पति या पत्नी पहले से पैरोल पर है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पति-पत्नी दोनों का पैरोल पाने का अधिकार अलग-अलग है और एक की रिहाई दूसरे के अधिकार को प्रभावित नहीं करती।
जस्टिस राजेश भारद्वाज और जस्टिस अमरजोत भट्टी की खंडपीठ ने सोनीपत निवासी बसंत कुमार उर्फ बंटी की याचिका स्वीकार करते हुए हरियाणा सरकार का 12 मई 2026 का आदेश रद्द कर दिया। अदालत ने उसे 10 सप्ताह की नियमित पैरोल पर रिहा करने का निर्देश दिया। सरकार ने यह कहते हुए पैरोल देने से इन्कार कर दिया था कि उसकी पत्नी सरिता पहले से पैरोल पर है और उसके जेल लौटने के बाद ही पति की पैरोल पर विचार होगा।
अदालत ने कहा कि यह आधार कानून के अनुरूप नहीं है। सुनवाई के दौरान बताया कि बसंत कुमार पहले भी पैरोल लेकर समय पर जेल लौट चुका है। वहीं, उसकी पत्नी की पैरोल के मामले में भी हाई कोर्ट पहले स्पष्ट कर चुका है कि पति के पैरोल पर होने से पत्नी की रिहाई नहीं रोकी जा सकती। अदालत ने कहा कि पैरोल सुधार और पुनर्वास की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। दोषियों का परिवार और समाज से संपर्क बनाए रखना आवश्यक है। इसलिए केवल पति या पत्नी के पैरोल पर होने के आधार पर दूसरे की पैरोल रोकना असंवैधानिक है। अदालत ने आवश्यक औपचारिकताएं पूरी करने के बाद तत्काल रिहाई के निर्देश दिए।