तकनीक के युग में आजकल जहां अशक्त लोग भी सहायक उपकरणों की मदद से पैराओलंपिक, नेशनल और इंटरनेशनल गेम्स में लंबी रेस लगाते हैं, वहीं ट्राइसिटी के इकलौते ऑर्थोपेडिक अस्पताल (पंचकूला सेक्टर-1 स्थित मदर टरेसा साकेत अस्पताल) में कुछ नहीं बदला।
यहां आज भी लोगों को 30-35 साल पुराने तकनीक से बने आर्टिफीशियल लींब मुहैया कराए जा रहे हैं।
लकड़ी व प्लास्टिक से बनी इस भारी भरकम आर्टिफीशियल लींब के सहारे सही तरीके से चलने और अपना काम करने में भी लोगों को परेशानी होती है।
सब्सिडी पर ये लींब मिलने के कारण मजबूरन लोग इसे खरीदने भी पहुंचते हैं।
हालांकि, विभागीय अधिकारियों का कहना है कि लोगों की डिमांड अब भी पुराने आर्टिफीशियल लींब की ही है।
वहीं, विभागीय सूत्रों का कहना है कि अस्पताल में आने वाले लोग आधुनिक आर्टिफीशियल लींब की डिमांड करते हैं और जब कोई कर्मचारी इस मसले पर उच्चधिकारियों से बात करता है तो डायरेक्टर स्तर तक मसला तो पहुंच जाता है, लेकिन वहीं का वहीं यह मामला दब जाता है।
भारी-भरकम कृत्रिम अंग से बनता है जख्म
इस अस्पताल में आने वाले अशक्त लोगों के लिए कृत्रिम अंग व सहायक उपकरण (कृत्रिम टांग, बाजू, व कैलीपर) मदर टेरेसा साकेत काउंसिल फॉर चंडीमंदिर में तैयार किए जाते हैं। ऐसे कृत्रिम अंग का इस्तेमाल कई लोगों के लिए परेशानी का सबब भी बन जाते हैं। इन भारी-भरकम कृत्रिम अंग के उपयोग से जख्म भी बन जाता है।
आधुनिक कृत्रिम अंग
यह पूरे तरीके से इलेक्ट्रानिक होता है। इसका कंट्रोल दिमाग और शरीर के मांसपेशियों से किया जाता है।
आधुनिक तकनीक से लाभ
ऊर्जा की कम खपत, वजन में हल्का, आत्मनिर्भरता, दिखने में सुंदर व टिकाऊ, अशक्त व्यक्ति भी तेज चल सकता है और दौड़ भी सकता है।
पुराने कृत्रिम अंग
इसमें पंजे में मूवमेंट नहीं होता। यह प्लास्टिक पाइप से बनाए जाते हैं।
पुराने तकनीक से नुकसान
वजन में भारी, कम टिकाऊ, सुंदर नहीं दिखता, दौड़ नहीं सकते, मांसपेसियों का लटकना, कटी हुई टांग में जख्म बनना।