हरियाणा में एक बार फिर सत्ता से दूर कांग्रेस के सामने अपार चुनौतियां हैं। एक तो पार्टी को गुटबाजी खत्म कर आगे बढ़ना होगा, दूसरा अपने कैडर को बिखरने से बचाना पड़ेगा। चूंकि, सत्ताधारी भाजपा और जजपा कांग्रेस को कमजोर करने के लिए हर दांव चलेंगी।
भाजपा उसके एससी और मुस्लिम वोट में सेंध लगाना चाहेगी तो जजपा जाट वोट बैंक को अपने साथ लाना चाहेंगे। ऐसे में पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा के सामने दोनों से पार पाने की बड़ी चुनौती होगी।
हुड्डा को जहां अपने सोनीपत, झज्जर व रोहतक गढ़ बचाने होंगे, वहीं सरकार से लोहा लेने के साथ कांग्रेस का कुनबा भी जोड़कर रखना होगा। पूर्व सीएम के सामने अब जिम्मेदारी और भी बड़ी होंगी, चूंकि वे शुरू से नेता प्रतिपक्ष का पद संभाल सकते हैं।
ऐसे में हुड्डा को सभी विधायकों को शुरू से विश्वास में लेकर चलना होगा। विधायकों में धड़ेबंदी होने से रोकना भी हुड्डा के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। कांग्रेस बीते पांच साल भी सत्ता से बाहर रही और अब फिर विपक्ष में बैठी है।
ऐसे में कार्यकर्ताओं को संतुष्ट करना आसान काम नहीं होगा। जाट समुदाय अपने कामों के लिए डिप्टी सीएम दुष्यंत चौटाला के साथ न लग जाए, ये भी हुड्डा को देखना पड़ेगा। अगर ऐसा हुआ तो कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ सकता है। क्योंकि, 2019 के विधानसभा चुनाव में जाट, एससी व मुस्लिम वोटर्स ने कांग्रेस का दिल खोलकर साथ दिया है।
भाजपा ने जैसे अपने पहले कार्यकाल के अंतिम समय में इनेलो के भीतर सर्जिकल स्ट्राइक कर एक के बाद एक अधिकतर विधायक अपने पाले में कर लिए, वैसा ही वह दूसरे कार्यकाल में कांग्रेस के साथ भी कर सकती है। इसलिए नए विधायकों को टूटने से बचाना होगा। पार्टी में पूर्व की तरह गुटबाजी भी हावी नहीं रहने देनी होगी।
हालिया चुनाव में कांग्रेस को गुटबाजी की वजह से भी सत्ता से दूर रहना पड़ा है। अगर पूर्व प्रदेशाध्यक्ष अशोक तंवर ने पद से हटने के बाद कांग्रेस से खुली बगावत न की होती तो हालात कुछ और हो सकते थे। ऐसे में हुड्डा के साथ ही कांग्रेस हाईकमान को भी सतर्क रहना होगा। कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष कुमारी सैलजा के लिए भी डगर अब आसान नहीं होगी।
उन्हें संगठन को प्रदेश में नए सिरे से खड़ा करना होगा। चूंकि, कुर्सी संभालने के बाद उन्हें अपनी टीम बनाने का समय ही नहीं मिला। इसके साथ जिला व ब्लॉक अध्यक्षों की नियुक्ति भी सबके साथ मिलकर करनी होगी।
हर प्रकोष्ठ और विभाग में नए चेहरों को आगे लाना होगा ताकि नए कार्यकर्ता पार्टी के साथ जुड़ सकें। सैलजा को यह भी देखना होगा कि तंवर जैसा कोई और नेता पार्टी में निकलकर न आए जो उनके लिए मुश्किलें खड़ी करे।